ज़ाहिर लखनवी
नाम है बाबू भइया
अरे भइया नमस्ते! हमार नाम बाबू भइया है। लखनऊ के रहने वाले हैं, और काम करते हैं टूरिस्ट गाइड का। अब आप सोच रहे होंगे कि “गाइड” मतलब बस आदमी को घुमाना-फिराना? अरे न न, हमार गाइडिंग में इमोशन है, टशन है, और सबसे बड़ी बात – लखनऊ वाला फैशन है!
अब देखिए, लखनऊ शहर खुदे एक किस्सा है। हर गली, हर चौराहा, हर इमारत का अपना एक इतिहास है, एक अदा है। और हम? हम हैं इस अदा के एम्बेसडर!
हमरा घर चौक इलाके में है – वहीं जहाँ इत्र की खुशबू हवा में तैरती है, और टुंडे कबाबी के आगे लाइन बिना खाए ही पेट भर देत है। हमारे पापा पान का कारोबार करत थे, और हम बचपन से ही सुनत आए हैं कि “बेटा, बात ऐसे करो कि सामने वाला कहे – वाह क्या बात है!”
तो बस, वही बात को दिल पे ले लिए। स्कूल में पढ़ाई तो ठीक-ठाक चली, लेकिन असली पढ़ाई तो इमामबाड़ा, रूमी दरवाज़ा, और हज़रतगंज की गलियों में हुई। जब दोस्त लोग पबजी खेलते थे, तब हम पुराने नवाबों की कहानियाँ पढ़ते थे।
पहली बार गाइडिंग का मौका मिला जब एक दिन रेलवे स्टेशन पे खड़े थे और एक फ़ॉरेनर टूरिस्ट रास्ता पूछ बैठा – “बड़ा इमामबाड़ा किधर है?”
हम बोले, “साहब, इधर से सीधे जाइए, फिर बाएँ मुड़िए, लेकिन अगर समय हो तो हम खुद ले चलते हैं, और साथ में कहानी भी सुनाते हैं।”
वो मान गया। पूरा दिन साथ घूमे, और आखिर में बोला – “यू शुड बी अ प्रोफेशनल टूर गाइड!”
बस भइया, वही दिन से तय हो गया – अब तो यही काम करेंगे, लेकिन स्टाइल में!
हमारे टूर में सिर्फ इमारतें नहीं दिखतीं – हम वहाँ का इतिहास, वहाँ के लोगों की बातें, और एक-एक ईंट की कहानी बताते हैं। मसलन, जब हम बड़ा इमामबाड़ा ले जाते हैं, तो कहते हैं – “भाई साहब, ये जो हॉल है न, पूरा बिना खंभे का है! सोचिए, नवाब ने जब बनाया था, तो कहा – ऐसाही कुछ बनाओ जो दुनिया में कहीं न हो!”
फिर जब हम किसी को पुराने लखनऊ की गलियों में ले जाते हैं, तो वहाँ की बोली भी सिखाते हैं – “का भइया, कहाँ चल दिहे? एक ठो कुल्फी खइले बिना का फायदा?”
हमर पहचान अब बन गई है – कुर्ता-पाजामा, एक झकास साफा, जेब में छोटा सा इत्र, और हाथ में लखनऊ के नक्शे वाली छड़ी। लोग दूर-दूर से हमरे टूर बुक कराते हैं – कहत हैं कि “बाबू भइया का साथ हो, तो टूर मजेदार होई।”
तो भइया, लखनऊ आना हो, तो बाबू भइया को याद करना। क्योंकि इहाँ सिर्फ शहर नहीं दिखाया जाता, एहसास कराया जाता है।
अंग्रेज़ टूरिस्ट और नवाबी जलवा
अब सुनिए भइया, एक दिन हम चौक पे खड़े थे, एक हाथ में कुल्फी, दूसरा हाथ कमर पे – गर्मी ऐसी पड़ रही थी कि लगता था सूरज खुद टूर पे निकल आया है। तभी एक गो लंबा-चौड़ा गोरा बाबू दिखा—बिलकुल फ़िल्मी अंग्रेज़ जइसे! चश्मा, हैट, कैमरा लटकाए, और हाथ में गूगल मैप।
हम आगे बढ़ के बोले, “हैलो सर! वेलकम टू लखनऊ! कान आई हेल्प यू?”
वो बोला, “आई वॉन्ट टू सी रीयल नवाब कल्चर, नॉट जस्ट टूरिस्ट प्लेसेज़।”
अब हम तो ठहरे नवाबी ठाठ वाले गाइड, हम बोले, “सर, आप बिलकुल सही आदमी से टकरा गए हैं। आइये, आज हम आपको लखनऊ का वो हिस्सा दिखाएंगे जो गूगल भी नहीं दिखा सकता!”
पहले ले गये हम बड़ा इमामबाड़ा। जाते ही उसका मुँह खुला रह गया। बोला, “ओह माय गॉड! दिस प्लेस इज़ मास्सिव!”
हम बोले, “सर, ये नवाब आसफ़-उद-दौला का बनाया हुआ है। बिना एक भी कॉलम के, इतना बड़ा हॉल! आज की टेक्नोलॉजी भी शरमा जाए।”
फिर ले गये भुलभुलैया। अंग्रेज़ बाबू बोला, “यू मीन पीपल एक्चुअली गेट लॉस्ट हियर?”
हम हँस के बोले, “सर, आप तो अभी अंदर घुसे नहीं, पाँच मिनट में आप कहेंगे – बाबू भइया, बचा लीजिए!”
और हुआ भी वही। बेचारा तीन चक्कर मार चुका था, एक ही जगह आ जा रहा था। हम बोले, “सर, बिना गाइड के लखनऊ घूमना मतलब बिना चाय के समोसा खाना – मजा अधूरा!”
फिर ले गये रूमी दरवाज़ा, और वहाँ पे बोले, “सर, देखिए इस दरवाज़े को – एकदम फ्रेम में फिट हो जाएगा। नवाबों का स्वागत यहीं से शुरू होता था।”
उसका चेहरा दमक उठा। बोला, “लखनऊ इज़ सो ब्यूटिफुल! पीपल आर सो फ्रेंडली, एंड यू आर ए वंडरफुल गाइड!”
हम बोले, “सर, इहाँ लोग पहले तहज़ीब से बात करत हैं, फिर सवाल पूछते हैं। और जब बाबू भइया साथ हो, तो एक्सपीरियंस भी रॉयल होई!”
अब खाने का टाइम हुआ, तो ले गये टुंडे कबाबी। जोर्ज बोला, “आई वांट समथिंग लोकल।”
हम बोले, “सर, टुंडे कबाबी खाये बिना लखनऊ छोड़ना मतलब आधा सपना अधूरा छोड़ना।”
उसने पहला निवाला लिया और आँखें बंद कर लीं। बोला, “आई एम इन लव!”
हम बोले, “सर, ई कबाब में जो मसाले हैं, वो दिल तक रास्ता बना लेते हैं।”
दिन भर घुमाया, हँसाया, खिलाया। जब छोड़े तो बोला, “नेक्स्ट टाइम आई एम कमिंग विद माय फैमिली। एंड आई वांट ऑनली यू एज माई गाइड!”
हम बोले, “सर, अगली बार नवाबी टोपी भी दिलवाएंगे, और रूमी दरवाज़े पे फोटो खिंचवा के इंस्टाग्राम पे डालवाएंगे – कैप्शन रहेगा ‘विथ बाबू भइया – द किंग ऑफ लखनऊ टूर्स!’”
प्यार हो गया टूर में
अब भइया, ज़िंदगी में बहुत टूरिस्ट देखे, देशी-विदेशी, बूढ़े-बुज़ुर्ग, बच्चे-खिलाड़ी। लेकिन उस दिन जो एक लड़की आयी ना… उफ्फ! दिल धक-धक करने लगा। नाम था उसका — नेहा कपूर, दिल्ली से आयी थी, अकेले घूमने। बैग लटकाए, बड़ी-बड़ी आँखें, और बात करे तो लगता कि रूह को भी चाय ऑफर कर दे!
हम एयरबीएनबी के बाहर इंतज़ार कर रहे थे, तभी टैक्सी से उतरी। बोली, “आप ही बाबू भइया हैं?”
हम बोले, “हमहीं हैं मैडम, जो लखनऊ घुमा दे बिना गाड़ी के!”
हँस पड़ी। बोली, “चलो फिर, शुरू करो अपना टूर।”
पहले ले गये हम हज़रतगंज। रास्ते में उसे तहज़ीब सिखाए – “यहाँ नमस्ते नहीं, आदाब कहा जाता है।”
वो बोली, “ओहो! तो लखनऊ सिर्फ इमारतों का नहीं, लहजे का भी शहर है?”
हम बोले, “मैडम, यहाँ इश्क भी अदब से किया जाता है।”
फिर ले गये छोटा इमामबाड़ा, वहाँ झील के किनारे बैठ के बोले, “देखिए, यहाँ नवाब लोग शाम को कव्वाली सुनते थे, और चाँदनी में महबूबा को खत पढ़ते थे।”
नेहा मुस्कुरा के बोली, “और आप? आप भी खत लिखते हैं?”
हम बोले, “अब तो वाट्सएप पे ही दिल की बात भेज देते हैं, लेकिन लफ्ज़ वही पुराने नवाबी रखते हैं।”
दिन भर घूमें। कभी रूमी दरवाज़ा, कभी राजा बाजार, कभी चाय पे चर्चा। हर जगह उसकी आँखों में एक अलग चमक दिखी। और हमारा दिल? अरे भइया, वो तो कबाब से भी पहले गल गया!
शाम को नेहा बोली, “बाबू भइया, आप सिर्फ गाइड नहीं हो, एकदम कहानी के किरदार लगते हो।”
हम बोले, “मैडम, जब आप जैसे श्रोता मिलें, तब तो हम मिर्ज़ा ग़ालिब भी बन जाएं!”
अगले दिन वो खुद तैयार होके बोली, “आज कहीं कम भीड़ वाली जगह ले चलो।”
हम ले गये बेगम हज़रत महल पार्क। वहाँ खामोशी थी, बस फूलों की खुशबू और हवा की सरसराहट।
वो धीरे से बोली, “बाबू भइया, कभी किसी टूरिस्ट से दिल लगाया है?”
हम थोड़ा शरमा गये। बोले, “मैडम, गाइड हूँ, गार्ड नहीं… दिल की चौकीदारी तो कभी करी नहीं।”
वो बोली, “तो आज से कीजिए। क्योंकि ये टूर मेरा सबसे यादगार टूर बन गया है। वजह – आप।”
अब भइया, हम ठहरे लखनवी – सीधा जवाब कहाँ देते हैं? हम बोले, “मैडम, लखनऊ की पहचान है तहज़ीब और नज़ाकत… तो इज़हार भी वही स्टाइल में होई। कल आखिरी दिन है आपका, हम एक सरप्राइज तैयार करेंगे।”
वो मुस्कुरा दी, और हम? बस, दिल संभाल के रह गये!
टूरिस्ट से तकरार
अब देखिए भइया, हर टूर मस्त नहीं होता। कुछ टूरिस्ट ऐसे भी आ जाते हैं जो सोचते हैं कि गाइड मतलब बस चलती-फिरती ऑडियो मशीन, जितना दबाओ, उतना बोले।
एक दिन का किस्सा है। एक बाबू साहब आये – दिल्ली से – नाम था आलोक वर्मा। पहली बार फोन पे ही बोले, “देखिए, मुझे टाइम वेस्ट नहीं करना। तीन घंटे में सारा लखनऊ घुमा दीजिए।”
हम बोले, “सर, ये लखनऊ है, पिज़्ज़ा नहीं कि तीन स्लाइस में खत्म हो जाए।”
वो बोले, “मैं बिज़ी आदमी हूँ।”
हम बोले, “कोई बात नहीं, हम भी वक़्त की कद्र करना जानते हैं।”
खैर, टूर शुरू हुआ। पहला स्टॉप – बड़ा इमामबाड़ा।
हम बोलने ही जा रहे थे कि बाबू साहब बोले, “इतिहास-वितिहास रहने दीजिए, सीधा बताइए क्या खास है यहाँ?”
हमने धीरे से मुस्कुरा के कहा, “सर, अगर खासियत ही सुननी है तो विकीपीडिया भी काफी है, लेकिन यहाँ तो एहसास मिलते हैं।”
वो भड़क गये। बोले, “आप लोग बस भावनाओं में बहा देते हो टूरिस्ट को। चार फोटो खींचो, दो कहानी सुनाओ और पैसे ऐंठ लो।”
अब भइया, बात दिल पे लग गई। हम बोले, “सर, एक बात बताइए – जब आप शादी में जाते हैं तो सिर्फ फेरे देखते हैं या बैंड-बाजा, खाना, कपड़े सब नोटिस करते हैं?”
वो बोले, “मतलब?”
हम बोले, “मतलब ये कि लखनऊ घूमना सिर्फ चार फोटो लेने का नाम नहीं है। यहाँ हर ईंट में तहज़ीब छुपी है, हर गली एक दास्तान कहती है। हम पैसे नहीं, वक्त और दिल लगाते हैं इस शहर को समझाने में।”
वो थोड़ा नरम पड़े, बोले, “ठीक है, फिर बताइए कुछ ऐसा जो बाकी गाइड नहीं बताते।”
अब हम तो ठहरे बाबू भइया! फौरन ले गये उन्हें नक्खास की गली में जहाँ पुराने घरों के झरोखों से अब भी दोपहर की कहानियाँ झाँकती हैं। वहाँ एक चायवाले से मिलवाया – जिनका बाबा नवाबों के दौर में रसोइया थे।
फिर ले गये रूमी दरवाज़े के पीछे वाला पुराना कुआँ, जहाँ अंग्रेज़ों से लड़ते हुए एक विद्रोही ने जान दी थी। बोले, “ये जगह आपको किसी बुकलेट में नहीं मिलेगी, लेकिन हम जानते हैं क्योंकि ये शहर हमारा है।”
बाबू वर्मा की आँखों में अब थोड़ी नरमी थी। बोले, “माफ करिए, शुरू में मैं थोड़ा गलत समझा। आप सच में इस शहर से मोहब्बत करते हैं।”
हम बोले, “सर, मोहब्बत भी करते हैं, इज्ज़त भी। लखनऊ हमारा घर है – और हर गाइड नहीं, गार्जियन बनके दिखाते हैं इसे।”
टूर खत्म हुआ, तो बाबू साहब हाथ जोड़ के बोले, “अब समझ में आया, गाइड सिर्फ जगह नहीं दिखाते, जज़्बात भी जिंदा रखते हैं।”
हम बोले, “चलो अब बात बनी!”
हम बाबू भइया हैं!
अब भइया, कहते हैं न – “हर सफर का एक अंजाम होता है”, लेकिन हमारे लिए तो हर टूर एक नई कहानी छोड़ जाता है। और इन कहानियों का ही तो नाम है – बाबू भइया!
एक दिन, सुबह-सुबह मोबाइल पे कॉल आया। देखा, नेहा का मैसेज था –
“गुड मॉर्निंग बाबू भइया, मैंने आपके लिए कुछ भेजा है।”
हम चौंके – खोले तो देखा, दिल्ली के एक बड़े ट्रैवल व्लॉग पे हमारा नाम छपा था – “Meet Babu Bhaiya – The Soul of Lucknow Tours”
नीचे हमारी तस्वीर, पीछे बड़ा इमामबाड़ा, और मुस्कुराते हुए हम!
दिल धक-धक करने लगा। इतने सालों से जो कर रहे थे, वो अब पहचान बन गया था।
कुछ ही दिनों में यूट्यूब वाले, इंस्टा वाले, ब्लॉग वाले – सब इंटरव्यू करने आने लगे। कोई कहता, “आपकी बोली में मिठास है”, कोई कहता, “आपका अंदाज़ एकदम नवाबी है।”
हम बोले, “भइया, हम तो वही हैं – पान खाने वाले, गली-गली लखनऊ दिखाने वाले!”
लेकिन अब भी हम वही पुराने मोहल्ले में रहते हैं, सुबह मस्जिद की अज़ान और मंदिर की घंटी सुन के उठते हैं। गली के बच्चे अब हमें देखकर चिल्लाते हैं, “बाबू भइया! आज किस टूर पे ले जा रहे हो?”
हम हँसते हैं, और कहते हैं, “आज नहीं भइया, आज आराम है – पर चाय पीने चलो, कहानियाँ तो हर दिन की नई हैं।”
फिर एक दिन, हमारे मोहल्ले में एक पोस्टर लगा –
“लखनऊ टूरिज्म अवॉर्ड – बेस्ट लोकल गाइड”
नाम – बाबू भइया।
वो दिन जब स्टेज पे बुलाया गया, तो पूरे चौक मोहल्ला तालियाँ बजा रहा था। हमने माइक पे जाकर बस इतना कहा –
“हम बाबू भइया हैं। और ये लखनऊ सिर्फ शहर नहीं, हमारा इश्क है। हम इसको रोज़ जीते हैं, और हर मेहमान को इसका दीवाना बना के भेजते हैं।”
अब लोग एयरपोर्ट से सीधे हमको फोन करते हैं – “बाबू भइया, हमारा टूर आपके बिना अधूरा है।”
नेहा कभी-कभी कॉल करती है, कहती है – “आपको मिस कर रही हूँ।”
हम मुस्कुरा के कहते हैं, “नेहा जी, लखनऊ बुलाइए, इश्क फिर से रिवाइंड हो जाएगा।”
अब हम सिर्फ गाइड नहीं रहे, लोग कहते हैं – “आप तो लखनऊ की जान हैं।”
और हम? हम बस इतना कहते हैं –
“नाम याद रखिए – बाबू भइया। कहानियाँ मुफ्त, तहज़ीब इनबिल्ट, और दिल… वो तो लखनऊ वाला है भइया!”
END




