Hindi - Romance

ख्वाबों की गली

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नीता देव


अध्याय 1: रंगों की चुप्पी

झाँसी की गलियों में सुबह की पहली किरण जब पुराने किलों की दीवारों से टकराकर उतरती थी, तब शहर में एक धीमी-सी हलचल शुरू होती थी। पर उस हलचल से दूर, एक छोटी-सी गली में, पुराने नीले दरवाज़े के पीछे राधा अपनी दुनिया में खोई हुई बैठी थी। लकड़ी की खड़खड़ाती खिड़की से छनकर आती धूप उसकी आधी-अधूरी पेंटिंग पर पड़ रही थी, जिसमें एक लड़की एक खिड़की के भीतर बैठी आकाश को देख रही थी—कुछ वैसा ही जैसे खुद राधा थी। कलाई तक रंगों में सनी हुई, वह ब्रश को बहुत नर्मता से चलाती, जैसे हर स्ट्रोक में कोई भावना पिरो रही हो—कभी अधूरी उम्मीद, कभी खोया हुआ सपना। उसके कमरे में न कोई आधुनिक दीवार घड़ी थी, न एलईडी लाइट, न फैशनेबल सजावट—बस एक कोने में पुरानी रेडियो की आवाज़ में किसी पुराने ग़ज़ल की धीमी तान बज रही थी, और दूसरी तरफ लकड़ी की अलमारी के ऊपर रखी एक जंग लगी हुई रंगों की पेटी थी, जिसे वह हर सुबह बड़े आदर से खोलती। यही उसका मंदिर था, यही उसका समय, यही उसका संसार। बाहर से राधा एक लोकल स्कूल में बच्चों को आर्ट सिखाने वाली ‘टीचर मैम’ थी, लेकिन अंदर से वह उन रंगों की कहानी थी जो ज़ुबान से नहीं निकलतीं, सिर्फ कैनवस पर उभरती हैं। शहर के लोग उसे समझ नहीं पाए, लेकिन उसे परवाह नहीं थी। वह जानती थी कि उसकी दुनिया का रास्ता थोड़ा टेढ़ा, थोड़ा संकोची और बहुत ही गहरा है—और उसे उसी रास्ते पर चलना है, बिना किसी को अपनी मंज़िल बताए।

राधा का जीवन दिखने में सादा था, लेकिन उसकी सोच, उसकी कल्पना और उसकी संवेदनाएं किसी उपन्यास से कम न थीं। घर में दादी थीं—शांता देवी—जो अब ज़्यादा नहीं बोलती थीं, लेकिन राधा को देखकर उनकी आँखों में एक मौन आशीर्वाद सा झलकता रहता था। हर सुबह जब दादी तुलसी में पानी देती थीं, राधा अपने कमरे में पहली चाय के साथ पेंटिंग के सामने बैठ जाती—जैसे एक साज़िंदे की पहली रियाज़ हो। वह ना तो सोशल मीडिया पर अपने आर्ट के फोटो डालती थी, ना किसी आर्ट गैलरी का हिस्सा थी—उसे किसी से मान्यता नहीं चाहिए थी, वह सिर्फ खुद को जानना चाहती थी, खुद को पाना चाहती थी। मगर कभी-कभी, उस खिड़की के बाहर उड़ते कबूतरों को देखकर उसका मन अनजाने ही पूछता—क्या उसकी पेंटिंग्स भी कभी उड़ेंगी, क्या कभी कोई बाहर की दुनिया से आएगा और उसकी खामोशी में छिपे रंगों को समझ पाएगा? उसे नहीं पता था कि उसी दिन, उसी गली से कुछ दूरी पर, एक कैमरे की क्लिक हो चुकी है—एक दीवार पर बनी उसकी पुरानी पेंटिंग को देखकर किसी की निगाहें ठहर गई हैं। और वही ठहराव, उसी शाम एक हलचल में बदलने वाला है—एक ऐसी मुलाकात की ओर बढ़ता हुआ, जो उसकी ख्वाबों की गली को पहली बार आवाज़ देने वाला है।

अध्याय 2: पहली झलक

दृशान मेहरा को शहरों की रफ्तार से अक्सर घुटन होती थी। दिल्ली की भागदौड़, कैमरे की चकाचौंध, और चेहरों की बनावटी मुस्कानें—वह सब अब उसके लिए केवल एक पैकेज्ड सच्चाई रह गई थीं, जिसमें भावनाएं पीछे छूट गई थीं। इसलिए जब उसे एक डॉक्युमेंट्री प्रोजेक्ट के लिए झाँसी आना पड़ा, तो वह यह सोचकर नहीं आया कि यह सिर्फ एक शूट होगा—बल्कि शायद अपने भीतर की थकान को कहीं मिटाने का प्रयास था। वह अपने DSLR कैमरे को कंधे पर टांगे, स्टेशन से बाहर निकला और ऑटो की खोज में था कि अचानक एक पुरानी टूटी दीवार पर उसकी नजर पड़ी। हल्के पीले रंग के प्लास्टर से ढंकी उस दीवार पर एक लड़की की पेंटिंग बनी थी—जो खिड़की से बाहर देख रही थी, ठीक वैसे ही जैसे किसी ने भीतर से बहुत कुछ देख लिया हो, लेकिन कहा कुछ नहीं। वह ठिठक गया। कैमरा अपने आप उठ गया, और लेंस के भीतर से उस पेंटिंग ने जैसे उसे देखा—उसका चेहरा, उसकी आंखें, उसकी चुप्पी। क्लिक। क्लिक। क्लिक। दृशान ने तीन तस्वीरें लीं लेकिन उसे लगा, जैसे वह कुछ कैद नहीं कर पाया, बल्कि खुद किसी और के ख्यालों में कैद हो गया है। कौन थी ये कलाकार? इस दीवार पर यह पेंटिंग कैसे आई? किसने बनाई? यह सवाल उसे अंदर तक खींचने लगे। उसे पहली बार किसी शहर की दीवार ने बुलाया था—न कि उसके भीतर की कोई ब्रीफिंग या कॉन्ट्रैक्ट।

शाम होते-होते दृशान ने उस दीवार के आसपास पूछताछ शुरू कर दी। एक पानवाले ने बताया कि वो पेंटिंग बहुत साल पहले बनी थी, और शायद उस गली के अंदर रहने वाली कोई लड़की बनाती थी, जो अब बच्चों को पेंटिंग सिखाती है। नाम—राधा। यह नाम सुनते ही दृशान को ऐसा लगा जैसे उसकी तस्वीर को एक नाम मिल गया हो, जैसे किसी अनजानी धुन को सुर मिल गया हो। उसने उस गली का रुख किया—संकीर्ण, पुरानी ईंटों से बनी, और बारिश से सीलन भरी लेकिन उनमें एक अनकहा सा आकर्षण था। वहां पहुंचकर उसने देखा, एक नीले रंग का दरवाज़ा अधखुला था और भीतर से धीमी ग़ज़ल की आवाज़ आ रही थी। हल्के झरोखे से उसने देखा—एक लड़की ब्रश से एक कैनवस पर कुछ बना रही थी। उसके हाथ रंगों से सने हुए थे, बाल लापरवाही से बंधे थे, लेकिन उसकी आंखें पूरी तरह चित्र में डूबी हुई थीं। दृशान वहीं खड़ा रहा—ना दस्तक दी, ना आवाज़ लगाई। उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी मंदिर के सामने खड़ा है, और भीतर कोई प्रार्थना कर रहा हो। उसे पहली बार महसूस हुआ कि कैमरे की लेंस से ज़्यादा पारदर्शी चीज़ें भी होती हैं—जो आंखों से नहीं, दिल से देखी जाती हैं। वह चुपचाप वापस लौट गया, लेकिन जाते-जाते अपनी जेब से एक छोटा सा कागज़ निकाला, जिसमें बस इतना लिखा—”तुम्हारी दीवार ने मुझे रोक लिया। क्या तुमने जानबूझकर उसे खुला छोड़ा था?” और वह वह कागज़ दरवाज़े के पास फर्श पर रखकर चला गया, बिना नाम, बिना किसी पहचान के—बस उस तस्वीर की तलाश में जो अब उसके ख्वाबों की गली बन चुकी थी।

अध्याय 3: रंग और रौशनी

राधा ने जब सुबह दरवाज़ा खोला, तो उसकी नज़र सबसे पहले फर्श पर रखे उस छोटे से कागज़ पर गई। उसने चौंकते हुए उसे उठाया, और पढ़ते ही दिल की धड़कन जैसे धीमे से तेज़ हो गई—”तुम्हारी दीवार ने मुझे रोक लिया। क्या तुमने जानबूझकर उसे खुला छोड़ा था?” बिना किसी नाम या हस्ताक्षर के, यह पंक्ति जैसे उसकी आत्मा के किसी कोने को छू गई थी। वर्षों से वह अपनी कला को बस कैनवस और दीवारों तक सीमित रखती आई थी, कभी किसी बाहरी प्रतिक्रिया की परवाह नहीं की, लेकिन यह एक पंक्ति… जैसे किसी ने उसकी ख़ामोशी को सुन लिया हो। वह दिनभर बेचैन रही, मन में सैकड़ों सवाल—कौन था? क्या वह सच में कलाकारों को समझ सकता है या यह कोई तुक्का था? लेकिन एक बात तय थी, राधा अब पहले जैसी शांत नहीं रही। दो दिन बाद जब वह स्कूल के आर्ट क्लास से लौट रही थी, तो गली के नुक्कड़ पर वही शख्स खड़ा मिला—कंधे पर कैमरा टांगे, आँखों में एक गहरी दृष्टि, और चेहरे पर कोई दिखावा नहीं। “तुम्हीं हो राधा?” उसने सीधे पूछा। राधा ने कुछ नहीं कहा, बस धीरे से सिर हिलाया। “मैं दृशान हूं… तुम्हारी दीवार से आया हूं।” उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, जैसे उसने खुद को पहले ही साबित कर दिया हो। राधा थोड़ी असहज हुई, लेकिन कुछ था उस आदमी में—कोई बनावटीपन नहीं, कोई अभिमान नहीं, बस एक सच्ची दिलचस्पी।

वह दोनों पास के एक चाय की दुकान पर बैठ गए। बातचीत झिझकते-झिझकते शुरू हुई—पहले पेंटिंग्स पर, फिर शहर की गलियों पर, फिर कला के भीतर छिपे दर्द और स्वतंत्रता पर। दृशान ने बताया कि वह फोटोग्राफी में भावनाओं को ढूंढता है, और राधा की पेंटिंग्स में उसे वह खामोशी दिखी थी जो शब्दों से ज़्यादा बोलती है। राधा को हैरानी हुई कि कोई उसके चित्रों को इस दृष्टि से देख सकता है, जहां रंग सिर्फ रंग नहीं बल्कि अनुभव हैं। दृशान ने जब पूछा कि क्या वह कभी अपनी कला को बड़े प्लेटफॉर्म पर ले जाना चाहेंगी, राधा ने एक क्षण को आंखें झुका लीं। “मैंने कभी किसी बड़े मंच की कल्पना नहीं की… मेरे रंगों का मकसद समझा जाना है, दिखाया जाना नहीं,” उसने धीरे से कहा। दृशान मुस्कराया, “कभी-कभी दिखाना ही समझाने का पहला कदम होता है।” वह शब्द जैसे राधा के भीतर कहीं बैठ गए। बातचीत धीरे-धीरे सहज होती गई, और राधा ने पहली बार महसूस किया कि किसी अजनबी के साथ कला पर बात करना कितना सुकूनदेह हो सकता है। जब वह विदा लेने को उठे, तो दृशान ने एक तस्वीर दिखाई—उसकी दीवार वाली पेंटिंग की, जिसे उसने अलग-अलग रोशनी में कैद किया था। “हर बार यह कुछ और कहती है,” उसने कहा। राधा ने पहली बार अपनी बनाई हुई चीज़ को किसी और की आंखों से देखा, और उसे लगा जैसे उसकी कला वाकई सांस ले रही हो। उस रात राधा ने कोई पेंटिंग नहीं बनाई, लेकिन वह कागज़, वह बात, और वह तस्वीरें उसके भीतर एक नया रंग भर गई थीं—एक ऐसा रंग, जो पाले हुए ख्वाबों की गली में पहली बार किसी रौशनी की तरह आया था।

अध्याय 4: अधूरी तस्वीरें

राधा के लिए वो मुलाकात अब एक स्मृति नहीं, एक अनुभव बन चुकी थी—जैसे उसकी पेंटिंग्स में अचानक कोई नई रेखा जुड़ गई हो जो बाकी रंगों को और गहरा कर देती है। मगर उस रेखा के साथ-साथ कुछ पुरानी दरारें भी उभर आईं जिनसे वह अक्सर नज़र चुरा लिया करती थी। उस शाम जब उसने अपनी अलमारी से वह पुराना स्केचबुक निकाला, जिसमें कॉलेज के दिनों की शुरुआती पेंटिंग्स थीं, उसकी अंगुलियाँ थोड़ी थरथराईं। उस स्केचबुक में एक पन्ना था, जिसके नीचे लिखा था—”राधा वर्मा: कलर्स ऑफ़ कंट्रास्ट”—वह वही स्केच था जिसे उसने एक बार दिल्ली के एक आर्ट इंस्टिट्यूट में भेजा था। उसका सपना था कि उसकी कला भी किसी आर्ट गैलरी की दीवार पर टंगे, कोई उसे समझे, कोई उसकी खामोश रेखाओं में कहानी देखे। लेकिन जवाब में आया था एक छोटा-सा ईमेल—“अभी आपकी कला अपरिपक्व है, इसमें बाज़ार की समझ नहीं है।” और बस वही दिन था जब राधा ने अपनी पेंटिंग्स को केवल दीवारों और अपने कमरे तक सीमित कर दिया था। अब जब दृशान जैसे किसी ने उसके चित्रों में भावनाएं खोजीं, तो वह भय और आशा के बीच झूलने लगी थी। क्या वाकई कोई उसकी कला को महसूस कर सकता है? या यह फिर से वही उम्मीद का धोखा है? उस रात राधा बहुत देर तक अपनी खाली कैनवस को देखती रही, जैसे इंतज़ार कर रही हो कि कोई रंग पहले खुद बोल उठे। उसकी उंगलियां ब्रश तक तो पहुँचीं, मगर कुछ बनने से पहले ही रुक गईं। डर था—उस अधूरेपन का, जिसे उसने सालों से छुपा रखा था।

दूसरी ओर दृशान भी उस मुलाकात के बाद बदल रहा था, लेकिन उसका बदलाव कहीं ज़्यादा भीतर से था। वह झाँसी में कैमरे के पीछे खड़ा ज़रूर था, मगर उसकी नज़र अब विषयों की तलाश नहीं कर रही थी, बल्कि भावनाओं के सिरों को पकड़ने की कोशिश कर रही थी—ठीक वैसे जैसे वह कभी खुद से किया करता था। एक दोपहर जब वह होटल के कमरे में अपने पुराने प्रोजेक्ट्स देख रहा था, तो उसकी स्क्रीन पर एक पुरानी तस्वीर रुकी—उसकी मां की, जो उसने अपनी आखिरी बीमारी के दौरान खींची थी। उसकी आंखों में एक नमी थी, और दृशान को वह दिन याद आया जब अस्पताल के बरामदे में उसने पहली बार तय किया था कि वह लोगों के जीवन को कैमरे में कैद करेगा—लेकिन तब से आज तक वह भावनाओं से दूर हो गया था, और सिर्फ फ्रेम्स में जी रहा था। राधा से मिलकर उसमें जैसे कोई पुरानी जड़ फिर से हरकत में आई हो, कोई खोया हुआ रंग फिर से तस्वीर बनने लगा हो। वह खुद को बदलते देख रहा था, और यह बदलाव उसे भयभीत भी करता था। क्या वह सचमुच उस लड़की की सादगी और गहराई में कुछ ढूंढ़ रहा है, या सिर्फ अपनी अधूरी तस्वीरों में एक रंग भरने की कोशिश कर रहा है? वह जानता था कि राधा किसी आम कहानी की नायिका नहीं थी, वह एक सजीव चित्र थी, जिसे समझने के लिए सिर्फ आंखें नहीं, आत्मा चाहिए थी। इसलिए जब उसने अगली सुबह राधा को एक मैसेज भेजा—“क्या मैं तुम्हारे आर्ट स्पेस को एक बार फिर देख सकता हूं?”—तो वह पूरी तरह तय नहीं था कि वह क्या ढूंढ़ रहा है, लेकिन इतना ज़रूर जानता था कि वह फिर से देखना चाहता है… शायद खुद को, शायद राधा को, या शायद उस अधूरी तस्वीर को जो दोनों के बीच धीरे-धीरे पूरी हो रही थी, लेकिन बिना किसी नाम के।

अध्याय 5: ख्वाबों की गली

झाँसी की गलियों में वो दोपहर कुछ अलग थी—न ज्यादा धूप, न ज्यादा साया—बस एक हल्की सी हवा जो जैसे हर पुराने घर की दीवारों से कोई दबी हुई बात निकालने की कोशिश कर रही थी। राधा ने जब दृशान का मैसेज पढ़ा तो कुछ पल चुपचाप खड़ी रही, जैसे शब्दों को पूरी तरह महसूस कर लेना चाहती हो। उसने ‘हाँ’ नहीं लिखा, लेकिन उसका दरवाज़ा उस दिन खुला ही रह गया, और उसकी खिड़की की परछाई से आते रौशनी के टुकड़े कमरे में बिखरे हुए थे। जब दृशान पहुँचा, तो राधा उस खिड़की के पास बैठी थी—कोई ब्रश हाथ में नहीं था, कोई कैनवस भी सामने नहीं, बस एक मौन जो किसी आने वाले संवाद की प्रतीक्षा कर रहा था। दृशान चुपचाप कमरे में दाख़िल हुआ, उसकी नज़र हर उस चीज़ पर ठहरती गई जिसे राधा ने अपनी आत्मा से सजाया था—कांच की बोतलों में भरे हुए रंग, पुराने अख़बारों पर उकेरे गए स्केच, दीवार पर चिपके हुए अधूरे नोट्स। और फिर उसने देखा, एक पेंटिंग जो अब तक उसने नहीं देखी थी—एक गली, जिसके दोनों तरफ झुकी हुई छतें थीं, और बीच में खड़ी एक लड़की, जिसके चेहरे पर न आँखें थीं, न मुंह—सिर्फ एक खामोश आकृति। “ये ख्वाबों की गली है,” राधा ने पहली बार बिना पूछे कहा। दृशान ने कुछ नहीं पूछा, उसने बस उस चित्र को देखा, जैसे वह उसकी कहानी को अपनी आंखों से पढ़ रहा हो। “ये वो जगह है जहाँ मैं जाती हूं, जब सब बंद हो जाता है,” राधा ने जोड़ा, “जहाँ कोई नहीं होता, सिर्फ मैं और मेरी कल्पना।”

दृशान ने धीरे से कहा, “मैं उस गली में पहुँचना चाहता हूं।” ये शब्द सुनकर राधा ने पहली बार उसकी तरफ देखा, सीधे, गहराई से। वहाँ कोई प्रेम का दावा नहीं था, न कोई आकर्षण का छलावा—बस एक जिज्ञासा, एक अनुरोध, जो आत्मा से निकला था। उस शाम, राधा ने एक पुराना कैनवस निकाला और उसे दृशान की तरफ बढ़ा दिया। “इसे पूरा करो,” उसने कहा। दृशान चौंका, “मैं तो चित्रकार नहीं हूं।” राधा मुस्कराई, “तुम्हारी तस्वीरों में जो अधूरा है, वो इस कैनवस में पूरा होगा।” दृशान ने कांपते हाथों से ब्रश पकड़ा, और पहली बार उसकी उंगलियों ने वो किया जो अब तक कैमरा करता आया था—किसी एहसास को थामना। राधा उसकी हर हरकत को देख रही थी, लेकिन टोक नहीं रही थी। शायद वह जानती थी कि जब कोई अपनी आत्मा से कुछ रचता है, तो उसे किसी दिशा की नहीं, बस विश्वास की ज़रूरत होती है। उस दिन वे दोनों एक नई शुरुआत कर रहे थे—एक गली के दो छोरों से आते हुए, एक साझा रंग खोजने की कोशिश में। जब सूरज ढलने लगा, तो कैनवस पर अब एक झुकी हुई लड़की की जगह दो आकृतियाँ थीं—एक झुकी हुई, एक सीधी खड़ी, और उनके बीच एक दरवाज़ा—खुला हुआ। राधा ने हल्की सांस ली और बुदबुदाई, “शायद अब ख्वाबों की गली में कोई और भी है…” और दृशान ने बिना कुछ कहे अपना कैमरा रखा, उस क्षण को न कैद किया, न चुराया—बस उसे जिया, पूरी तरह, पहली बार बिना लेंस के।

अध्याय 6: एहसास के किनारे

झाँसी की वो शाम जब धीरे-धीरे हल्के जामुनी रंग में ढल रही थी, राधा की खिड़की से आती हवा में कोई नई मिठास थी, जैसे कमरे की दीवारें भी जान गई हों कि अब यहाँ अकेलेपन की आदत नहीं रही। दृशान के साथ बिताए उन कुछ दिनों में जैसे राधा ने एक अलग ही भाषा में जीना सीख लिया था—जिसमें शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, सिर्फ नज़रों, रंगों और सन्नाटों के बीच बहती हल्की मुस्कानें ही सब कुछ कह जाती थीं। वह अब दिन की शुरुआत कैनवस की ओर देखने से नहीं, बल्कि दृशान की किसी नई बात को दोहराने से करती—जैसे “हर तस्वीर की आवाज़ होती है, सुन सको तो सुनो…”। उस दिन राधा ने कुछ अलग करने की सोची। उसने एक नई पेंटिंग शुरू की—जिसमें कोई रंग नहीं था, सिर्फ काले, भूरे और सफेद स्ट्रोक्स थे। ये उसकी पहली मोनोक्रोम पेंटिंग थी—और विषय था ‘ख़ामोशी’। चित्र में एक कैमरा था, जो लेंस के भीतर खुद एक आँख जैसा दिखता था—और उस आँख में राधा ने खुद को चित्रित किया था, अधूरे आकार में। जब दृशान ने यह चित्र देखा, वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला—”तुमने मुझे बना दिया है, पर अपने भीतर समेट कर। क्या मैं वाकई तुम्हारी नज़रों में ऐसा ही हूं?” राधा ने पहली बार उसे आंखों में देखा और कहा, “तुम वही हो जो मुझे देखने के लिए देख रहे हो, बाक़ी दुनिया बस तस्वीर खींचती है।”

उन शब्दों ने दृशान को भीतर तक छू लिया। उसने कैमरा उठाया और राधा की उस पेंटिंग को, बिना किसी एंगल बदले, बस वैसे ही कैद किया—जैसे वह हमेशा की तरह कैनवस पर नहीं, बल्कि किसी एहसास के किनारे खड़ी हो। वे दोनों अब बातों से ज़्यादा चुपियों में एक-दूसरे को महसूस कर रहे थे। राधा को कभी-कभी डर लगता था—कि कहीं ये सब भी एक सपना न हो, जो किसी सुबह टूट जाए। मगर फिर दृशान की मौजूदगी, उसकी संवेदनशीलता, और उसका कुछ न कहकर सब कुछ कह देना, उसे भरोसा देता। एक दिन, दृशान ने उसे बताया कि एक बड़ा आर्ट और फोटोग्राफी फेस्टिवल दिल्ली में होने वाला है, और वह चाहता है कि राधा अपनी पेंटिंग्स के साथ उसमें हिस्सा ले। राधा हँसी, लेकिन उसमें एक झिझक थी—जैसे कोई पंछी जो उड़ना चाहता है पर अपने पंखों की मजबूती पर विश्वास नहीं कर पा रहा हो। “अगर मैं वहां गई, और किसी ने मेरी पेंटिंग्स को फिर ‘परिपक्व नहीं’ कहा तो?” वह बोली। दृशान ने धीमे से उसका हाथ पकड़ा और कहा, “अब तुम एक पेंटिंग नहीं, एक पूरी गली हो—ख्वाबों से भरी, और उनमें कोई न कोई जरूर घर ढूंढ़ लेगा।” यह शब्द राधा को भीतर तक छु गए। उस दिन उन्होंने साथ में एक और पेंटिंग बनाई—इस बार कैनवस पर दो हाथ थे, एक रंगों से सना, एक कैमरे की पकड़ में, और दोनों के बीच एक रेखा—जो अब टूटती नहीं थी, सिर्फ जुड़ती जाती थी। जैसे दो आत्माएं धीरे-धीरे एक ही किनारे की तरफ बढ़ रही थीं—जहाँ शब्दों की नहीं, सिर्फ एहसास की ज़रूरत थी।

अध्याय 7: शहर की दूरी

दिल्ली जाने की बात जैसे ही सामने आई, राधा की दुनिया फिर एक बार उस दहलीज़ पर खड़ी हो गई जहाँ से उसने कभी अपने सपनों को बाहर जाते देखा था, फिर पीछे हटकर बंद दरवाज़े में खुद को समेट लिया था। दृशान की बातों में सच्चाई थी, उसका भरोसा भी था, लेकिन राधा की झिझक अब भी वैसी ही थी—जैसे कोई बीज जो मिट्टी फाड़कर बाहर आना चाहता है, लेकिन धूप की तेज़ी से डरता हो। “मैं तैयार नहीं हूं,” राधा ने दृशान से कहा, उसकी आवाज़ धीमी थी पर उसमें कांपती हुई हिचक थी। दृशान ने कोई तर्क नहीं दिया, कोई बहस नहीं की, बस एक गहरी सांस ली और कहा, “कभी-कभी तैयार होना नहीं, बस चल पड़ना ज़रूरी होता है, राधा।” वह दिन राधा के भीतर कुछ तोड़ गया—या शायद कुछ नया उग आया, जिसका नाम उसे भी नहीं मालूम था। लेकिन उसने दिल्ली जाने से मना कर दिया, और दृशान उसी शाम लौटने की तैयारी करने लगा। उसके सूटकेस में कपड़े कम थे, और यादें ज़्यादा। झाँसी स्टेशन पर जब राधा उसे छोड़ने आई, तो कोई औपचारिक विदाई नहीं थी, कोई वादा नहीं, बस एक अधूरी मुस्कान जो दोनों के बीच लटकी रह गई। ट्रेन चल पड़ी, और राधा के सामने एक बार फिर वही पुरानी गली थी—पर इस बार उसकी दीवारें सूनी नहीं थीं, वो अब दृशान के रंगों से भी भरी थीं। मगर उस रंग में थोड़ी सी धुंध भी थी, जैसे किसी तस्वीर पर जमी धूल जो हर बार छूने पर हल्की-सी उड़ती हो, पर पूरी तरह मिटती न हो।

दृशान के लौटने के बाद राधा का कमरा पहले जैसा नहीं रहा। उसके कैनवस पर अब रंग कम, और खाली जगह ज़्यादा होने लगी। वह पेंटिंग करने बैठती, लेकिन ब्रश बीच में ही रुक जाता। एक हफ्ते तक उसने खुद को काम में उलझाए रखा—स्कूल, बच्चों की क्लास, और दादी की दवाइयाँ। लेकिन हर बार जब दरवाज़ा खोलती, तो लगता जैसे कोई आने वाला था—फिर न आता। दूसरी ओर, दिल्ली की चकाचौंध में लौटकर भी दृशान भीतर से खामोश था। वह कैमरा उठाता, शूट्स पर जाता, लेकिन हर फ्रेम में उसे कुछ अधूरा महसूस होता—जैसे लेंस के पार जो कहानी थी, उसमें कोई रंग गायब था। उसने कई बार राधा को कॉल करना चाहा, फिर सोच कर रुक गया—कहीं उसकी खामोश सहमति को वह फिर से हिला न दे। राधा ने भी कभी कॉल नहीं किया, लेकिन एक चिट्ठी लिखी—एक साधारण कागज़ पर, जिसमें उसने पहली बार लिखा कि कैसे दृशान उसकी गली में रौशनी की तरह आया, कैसे उसने उसे अपने डर से बाहर निकलना सिखाया, लेकिन वह अब भी खुद से लड़ रही है। उसने वह चिट्ठी डाक में नहीं डाली—बस अपने तकिए के नीचे रख दी, जैसे खुद को ही भेजी गई हो। दिन बीतते गए, और दूरियाँ स्थिर हो गईं—न कम हुईं, न बढ़ीं, बस दोनों की दुनिया में मौन की तरह बहती रहीं। लेकिन वो मौन भी बोलता था—राधा की हर पेंटिंग की खाली जगहों में, और दृशान की हर तस्वीर के बाएँ कोने में, जहाँ कोई आकृति कभी पूरी न हुई थी। शायद ये वही शहर की दूरी थी—जहाँ किलोमीटर से ज़्यादा, डर, झिझक, और अधूरे ख्वाब बिछे रहते हैं।

अध्याय 8: अधूरी चिट्ठी

राधा की दुनिया अब दो हिस्सों में बंट चुकी थी—एक जो बाहर सबके लिए था, वही पुरानी, संयमित, शांत राधा जो बच्चों को आर्ट सिखाती थी, मोहल्ले की लड़कियों को रंगों से दोस्ती करना सिखाती थी, दादी के साथ तुलसी में जल देती थी; और दूसरा हिस्सा, जो भीतर कहीं सिमटा पड़ा था—दृशान के जाने के बाद की खामोशी, जो न चीखती थी, न टूटती थी, बस हर दिन एक नई परछाई छोड़ जाती थी। उसी खामोशी के बीच एक दिन उसने उस चिट्ठी को फिर से निकाला, जिसे कई बार पढ़ा, फिर मोड़कर वापस रख देती थी। लेकिन इस बार वह कुछ और जोड़ना चाहती थी, कुछ ऐसा जो अब तक अनकहा था। उसने लिखा—“तुम्हारे जाने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मेरी ख्वाबों की गली में अब सिर्फ मेरे नहीं, तुम्हारे भी कदमों की ध्वनि है। मैं उस रेखा तक पहुँच चुकी हूं जहाँ मुझे तय करना है—कि मैं उस रेखा को दीवार बनाऊं या पुल। तुम्हारी बात सच थी, चल पड़ना ही शुरुआत होती है, मगर मैं अब भी ठहरी हुई हूं… शायद डरती हूं, या शायद खुद को ही रोक रही हूं। क्या ये डर मेरा है या मेरे चारों ओर की दुनिया का?” उसकी कलम जैसे उसके ही भीतर की गांठें खोल रही थी। उसने कई बार कोशिश की चिट्ठी को भेजने की, मगर हर बार अंत में वह उसे किसी किताब में दबा देती, जैसे उस कहानी को वहीं सहेज देना चाहती हो जहाँ से वह निकली थी।

दूसरी ओर दिल्ली की रफ्तार के बीच दृशान एक अजीब से विराम में था। उसने कई नई जगहों की शूटिंग की, कैमरे में नए चेहरे, नए मौसम कैद किए, पर हर फ्रेम उसे खोखला लगता। उसकी लेंस अब उस तीव्रता से फोकस नहीं कर पाती थी जैसे पहले करती थी, जैसे उसके भीतर कुछ धुंधला हो रहा था—या यूं कहें, जैसे वह किसी और फ्रेम में अटका हो। राधा की आवाज़, उसकी मौन मौजूदगी, उसकी पेंटिंग्स की महक अब उसकी तस्वीरों से टकराने लगी थी। एक दिन जब वह अपने पुराने लैपटॉप में तस्वीरें整理 कर रहा था, उसने वह फोल्डर खोला जिसमें झाँसी के दौरे की सारी तस्वीरें थीं। दीवार वाली पेंटिंग, राधा के कमरे की खिड़की, और वो आखिरी कैनवस जिसमें दो आकृतियाँ थीं और एक खुला दरवाज़ा। उसकी आंखें वहीं रुक गईं। “क्या मैं उस दरवाज़े को बंद करके चला आया?” उसने खुद से पूछा। उसने उठकर अपना कैमरा बंद किया, और पहली बार बिना किसी शूट के, बिना किसी प्लान के उसने झाँसी की टिकट बुक कर दी। इधर राधा उस शाम फिर से अपनी खिड़की के पास बैठी थी, उसी पेंटिंग के सामने जो अब तक अधूरी थी—जिसमें एक आकृति खड़ी थी लेकिन सामने की आकृति अब तक बनाई नहीं गई थी। वह सोच ही रही थी कि आज वह इसे पूरा करेगी, कि दरवाज़े की घंटी बजी। दरवाज़ा खोला, तो सामने वही चेहरा था—थका हुआ, मगर सच्चा; खामोश, मगर बहुत कुछ कहता हुआ। दृशान ने कुछ नहीं कहा, बस हाथ में एक लिफाफा था—उसके भीतर राधा की अधूरी चिट्ठी थी, जो शायद उसने भेजी नहीं थी, पर दृशान तक फिर भी पहुँच गई थी। राधा चौंकी नहीं, डर नहीं हुई, बस मुस्कराई, जैसे एक लंबा अधूरा वाक्य अंततः विराम पा गया हो। उस शाम वह पेंटिंग पूरी हुई, और पहली बार उसमें दोनों आकृतियाँ थीं—एक-दूसरे की ओर बढ़ती हुई, और उनके बीच कोई दरवाज़ा नहीं, सिर्फ एक खुला रास्ता, ख्वाबों की गली से निकलकर असली दुनिया तक जाता हुआ।

अध्याय 9: प्रदर्शनी का रंग

दिल्ली की उस आर्ट गैलरी के बाहर बड़ी-बड़ी बैनरों में नाम थे—प्रसिद्ध चित्रकारों, नवोदित कलाकारों, फोटोग्राफरों और क्रिटिक्स के। रंगीन लाइट्स, वाइन के गिलासों की खनक और चर्चा करते चेहरों के बीच, राधा एक कोने में खड़ी थी—हल्के पीले रंग की सूती साड़ी में, बिना किसी मेकअप या दिखावे के, लेकिन उसके चेहरे पर एक ऐसी स्थिरता थी जो उसके भीतर के बदलाव की गवाही दे रही थी। यह उसका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था, वह भी राजधानी की सबसे नामचीन दीर्घा में। दीवारों पर टंगी उसकी पेंटिंग्स एकदम अलग थीं—न आधुनिक डिज़ाइन, न फैशन के रंग, सिर्फ कहानियाँ—उन गलियों की, चुप्पियों की, अधूरे कैनवसों की और उस लड़की की जिसने रंगों से खुद को समझा। उसके चित्रों के सामने भीड़ धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी, और हर कोई जैसे कुछ देर थम कर उन्हें पढ़ रहा था, निहार रहा था। लोग यह पूछ रहे थे, “ये कलाकार कौन है?” और तभी किसी ने दीवार पर उस अंतिम पेंटिंग को देखा—जिसमें एक कैमरा लेंस में समाई दो आकृतियाँ थीं, एक झाँसी की गली में और दूसरी एक शहर की खिड़की में, और उनके बीच एक सेतु था—रंगों और रौशनी से बना। ठीक उसी वक्त दृशान कमरे के दूसरी छोर से चला आया, कैमरा कंधे पर नहीं था, क्योंकि आज वह तस्वीर लेने नहीं, सिर्फ जीने आया था।

राधा ने उसे देखा, और उनकी नज़रों के बीच कोई परिचय की ज़रूरत नहीं थी। वह मुस्कराई, दृशान ने सिर हिलाया, और दोनों चुपचाप उस पेंटिंग के सामने खड़े हो गए जैसे वहाँ उनकी कहानी ही दीवार पर टंगी हो। कुछ पत्रकारों ने राधा से सवाल करने चाहे, लेकिन उसने विनम्रता से कहा, “मैं नहीं, मेरी पेंटिंग्स जवाब देंगी।” उस प्रदर्शनी में सिर्फ कला की सराहना नहीं हुई, बल्कि एक छोटे शहर की लड़की की आत्मा, उसकी भाषा, उसका साहस और उसकी प्रेमकथा को पहली बार बिना किसी मंच के, खुद उसकी रचना ने सबके सामने रखा। देर रात जब गैलरी खाली होने लगी, राधा और दृशान उस दीवार के सामने आखिरी बार रुके, जहाँ वह पुरानी ‘ख्वाबों की गली’ वाली पेंटिंग टंगी थी। राधा ने धीरे से कहा, “इस गली ने मुझे बहुत कुछ दिया, लेकिन सबसे बड़ा उपहार था—तुम्हारे कैमरे की वो नज़र, जिसने मेरे डर को देख लिया।” दृशान ने जवाब में उसका हाथ पकड़ लिया, और बोला, “और तुम्हारे रंगों ने मेरी खामोशी को आवाज़ दी।” उस पल में कोई तालियाँ नहीं थीं, कोई दर्शक नहीं, कोई फ्रेम नहीं—सिर्फ दो रचनाकार, जिन्होंने एक-दूसरे की अधूरी तस्वीरों को पूरा किया था, और अब जब सब चित्र पूर्ण हो चुके थे, तो जीवन की प्रदर्शनी शुरू होने वाली थी—उनके अपने रंगों में, अपनी रोशनी में।

अध्याय 10: पूर्णता की रेखा

कुछ महीनों बाद, झाँसी की वही पुरानी गली जहाँ कभी राधा अपनी दुनिया से कटा-कटा जीती थी, अब एक नई पहचान पा चुकी थी। वहां आने-जाने वाले लोग दीवारों पर लगी पेंटिंग्स को देखकर रुकते, फोटो खींचते, बच्चों को बताते कि “यही वो जगह है जहाँ से वो बड़ी कलाकार राधा वर्मा की शुरुआत हुई थी।” लेकिन राधा अब इन तारीफों या पहचान से परे जा चुकी थी। उसके लिए अब कला कोई प्रमाण नहीं, बल्कि प्रार्थना बन चुकी थी—शब्दहीन, प्रदर्शन-रहित, सिर्फ अस्तित्व का विस्तार। उसके आँगन में अब हर रोज़ रंग बिखरते थे, लेकिन अब वे अकेले नहीं होते थे। दृशान अब झाँसी का ही एक हिस्सा बन चुका था—उसकी सुबहें अब कैमरे की जगह चाय की प्यालियों से शुरू होतीं और शामें राधा के कैनवस के कोने पर बैठकर खत्म होतीं। दोनों ने मिलकर उस पुराने घर में एक छोटा-सा आर्ट स्टूडियो बना लिया था, जिसका नाम उन्होंने रखा—“ख्वाबों की गली”। यहां आने वाले बच्चों को राधा रंगों की भाषा सिखाती, तो दृशान उन्हें यह समझाता कि हर चेहरा एक कहानी है, अगर उसे गौर से देखा जाए। दोनों मिलकर छोटे शहर के बच्चों को न केवल कला, बल्कि आत्मविश्वास की शिक्षा दे रहे थे—कि तुम्हारे ख्वाब तुम्हारे होने से छोटे नहीं हैं।

एक दिन जब स्टूडियो में बच्चों की छुट्टी थी, राधा अपने पुराने स्केचबुक को पलटते हुए मुस्कराई। वही स्केचबुक जिसमें उसकी पहली अस्वीकृत रचना थी, वही जो कभी उसे तोड़ गई थी। अब वही स्केच उसे अपनी यात्रा की शुरुआत लगती थी—एक ऐसी यात्रा जहाँ टूटना जरूरी था ताकि वह खुद को दोबारा बना सके। उसने एक नई पेंटिंग शुरू की, जिसमें झाँसी के किले की पृष्ठभूमि थी, और सामने एक लड़की खड़ी थी, लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी—उसके बगल में एक युवक था, जिसके हाथ में कैमरा नहीं, बल्कि रंगों की एक ट्रे थी। यह पेंटिंग पूर्णता की घोषणा नहीं थी, बल्कि उस संतुलन की प्रतीक थी जहाँ दो अधूरी आत्माएं एक साथ आकर संपूर्ण हो जाती हैं। जब दृशान ने यह पेंटिंग देखी, वह कुछ देर शांत रहा, फिर बोला, “क्या हम अब इस कहानी का अंत लिख सकते हैं?” राधा ने उसकी ओर देखा और कहा, “नहीं, हम इसका अंत नहीं, इसकी शुरुआत जी सकते हैं।” उसी रात, खुले आसमान के नीचे, पुराने स्टूडियो की छत पर, दोनों ने एक सफेद कैनवस को रंगों से भरते हुए हाथ थाम लिए। अब न कोई ख्वाब अधूरा था, न कोई रेखा टूटी हुई। यह नायक और नायिका की प्रेमकथा नहीं थी, यह दो कलाकारों की साझी खोज थी—अपने भीतर के उस हिस्से की, जो केवल तब प्रकट होता है जब कोई दूसरा बिना डर, बिना दिखावा, बस प्रेम से कहे—”तुम अधूरी नहीं हो, तुम वह रचना हो जिसे पूरा देखने के लिए मैं आया हूँ।”

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