नीता देव
अध्याय 1: रंगों की चुप्पी
झाँसी की गलियों में सुबह की पहली किरण जब पुराने किलों की दीवारों से टकराकर उतरती थी, तब शहर में एक धीमी-सी हलचल शुरू होती थी। पर उस हलचल से दूर, एक छोटी-सी गली में, पुराने नीले दरवाज़े के पीछे राधा अपनी दुनिया में खोई हुई बैठी थी। लकड़ी की खड़खड़ाती खिड़की से छनकर आती धूप उसकी आधी-अधूरी पेंटिंग पर पड़ रही थी, जिसमें एक लड़की एक खिड़की के भीतर बैठी आकाश को देख रही थी—कुछ वैसा ही जैसे खुद राधा थी। कलाई तक रंगों में सनी हुई, वह ब्रश को बहुत नर्मता से चलाती, जैसे हर स्ट्रोक में कोई भावना पिरो रही हो—कभी अधूरी उम्मीद, कभी खोया हुआ सपना। उसके कमरे में न कोई आधुनिक दीवार घड़ी थी, न एलईडी लाइट, न फैशनेबल सजावट—बस एक कोने में पुरानी रेडियो की आवाज़ में किसी पुराने ग़ज़ल की धीमी तान बज रही थी, और दूसरी तरफ लकड़ी की अलमारी के ऊपर रखी एक जंग लगी हुई रंगों की पेटी थी, जिसे वह हर सुबह बड़े आदर से खोलती। यही उसका मंदिर था, यही उसका समय, यही उसका संसार। बाहर से राधा एक लोकल स्कूल में बच्चों को आर्ट सिखाने वाली ‘टीचर मैम’ थी, लेकिन अंदर से वह उन रंगों की कहानी थी जो ज़ुबान से नहीं निकलतीं, सिर्फ कैनवस पर उभरती हैं। शहर के लोग उसे समझ नहीं पाए, लेकिन उसे परवाह नहीं थी। वह जानती थी कि उसकी दुनिया का रास्ता थोड़ा टेढ़ा, थोड़ा संकोची और बहुत ही गहरा है—और उसे उसी रास्ते पर चलना है, बिना किसी को अपनी मंज़िल बताए।
राधा का जीवन दिखने में सादा था, लेकिन उसकी सोच, उसकी कल्पना और उसकी संवेदनाएं किसी उपन्यास से कम न थीं। घर में दादी थीं—शांता देवी—जो अब ज़्यादा नहीं बोलती थीं, लेकिन राधा को देखकर उनकी आँखों में एक मौन आशीर्वाद सा झलकता रहता था। हर सुबह जब दादी तुलसी में पानी देती थीं, राधा अपने कमरे में पहली चाय के साथ पेंटिंग के सामने बैठ जाती—जैसे एक साज़िंदे की पहली रियाज़ हो। वह ना तो सोशल मीडिया पर अपने आर्ट के फोटो डालती थी, ना किसी आर्ट गैलरी का हिस्सा थी—उसे किसी से मान्यता नहीं चाहिए थी, वह सिर्फ खुद को जानना चाहती थी, खुद को पाना चाहती थी। मगर कभी-कभी, उस खिड़की के बाहर उड़ते कबूतरों को देखकर उसका मन अनजाने ही पूछता—क्या उसकी पेंटिंग्स भी कभी उड़ेंगी, क्या कभी कोई बाहर की दुनिया से आएगा और उसकी खामोशी में छिपे रंगों को समझ पाएगा? उसे नहीं पता था कि उसी दिन, उसी गली से कुछ दूरी पर, एक कैमरे की क्लिक हो चुकी है—एक दीवार पर बनी उसकी पुरानी पेंटिंग को देखकर किसी की निगाहें ठहर गई हैं। और वही ठहराव, उसी शाम एक हलचल में बदलने वाला है—एक ऐसी मुलाकात की ओर बढ़ता हुआ, जो उसकी ख्वाबों की गली को पहली बार आवाज़ देने वाला है।
अध्याय 2: पहली झलक
दृशान मेहरा को शहरों की रफ्तार से अक्सर घुटन होती थी। दिल्ली की भागदौड़, कैमरे की चकाचौंध, और चेहरों की बनावटी मुस्कानें—वह सब अब उसके लिए केवल एक पैकेज्ड सच्चाई रह गई थीं, जिसमें भावनाएं पीछे छूट गई थीं। इसलिए जब उसे एक डॉक्युमेंट्री प्रोजेक्ट के लिए झाँसी आना पड़ा, तो वह यह सोचकर नहीं आया कि यह सिर्फ एक शूट होगा—बल्कि शायद अपने भीतर की थकान को कहीं मिटाने का प्रयास था। वह अपने DSLR कैमरे को कंधे पर टांगे, स्टेशन से बाहर निकला और ऑटो की खोज में था कि अचानक एक पुरानी टूटी दीवार पर उसकी नजर पड़ी। हल्के पीले रंग के प्लास्टर से ढंकी उस दीवार पर एक लड़की की पेंटिंग बनी थी—जो खिड़की से बाहर देख रही थी, ठीक वैसे ही जैसे किसी ने भीतर से बहुत कुछ देख लिया हो, लेकिन कहा कुछ नहीं। वह ठिठक गया। कैमरा अपने आप उठ गया, और लेंस के भीतर से उस पेंटिंग ने जैसे उसे देखा—उसका चेहरा, उसकी आंखें, उसकी चुप्पी। क्लिक। क्लिक। क्लिक। दृशान ने तीन तस्वीरें लीं लेकिन उसे लगा, जैसे वह कुछ कैद नहीं कर पाया, बल्कि खुद किसी और के ख्यालों में कैद हो गया है। कौन थी ये कलाकार? इस दीवार पर यह पेंटिंग कैसे आई? किसने बनाई? यह सवाल उसे अंदर तक खींचने लगे। उसे पहली बार किसी शहर की दीवार ने बुलाया था—न कि उसके भीतर की कोई ब्रीफिंग या कॉन्ट्रैक्ट।
शाम होते-होते दृशान ने उस दीवार के आसपास पूछताछ शुरू कर दी। एक पानवाले ने बताया कि वो पेंटिंग बहुत साल पहले बनी थी, और शायद उस गली के अंदर रहने वाली कोई लड़की बनाती थी, जो अब बच्चों को पेंटिंग सिखाती है। नाम—राधा। यह नाम सुनते ही दृशान को ऐसा लगा जैसे उसकी तस्वीर को एक नाम मिल गया हो, जैसे किसी अनजानी धुन को सुर मिल गया हो। उसने उस गली का रुख किया—संकीर्ण, पुरानी ईंटों से बनी, और बारिश से सीलन भरी लेकिन उनमें एक अनकहा सा आकर्षण था। वहां पहुंचकर उसने देखा, एक नीले रंग का दरवाज़ा अधखुला था और भीतर से धीमी ग़ज़ल की आवाज़ आ रही थी। हल्के झरोखे से उसने देखा—एक लड़की ब्रश से एक कैनवस पर कुछ बना रही थी। उसके हाथ रंगों से सने हुए थे, बाल लापरवाही से बंधे थे, लेकिन उसकी आंखें पूरी तरह चित्र में डूबी हुई थीं। दृशान वहीं खड़ा रहा—ना दस्तक दी, ना आवाज़ लगाई। उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी मंदिर के सामने खड़ा है, और भीतर कोई प्रार्थना कर रहा हो। उसे पहली बार महसूस हुआ कि कैमरे की लेंस से ज़्यादा पारदर्शी चीज़ें भी होती हैं—जो आंखों से नहीं, दिल से देखी जाती हैं। वह चुपचाप वापस लौट गया, लेकिन जाते-जाते अपनी जेब से एक छोटा सा कागज़ निकाला, जिसमें बस इतना लिखा—”तुम्हारी दीवार ने मुझे रोक लिया। क्या तुमने जानबूझकर उसे खुला छोड़ा था?” और वह वह कागज़ दरवाज़े के पास फर्श पर रखकर चला गया, बिना नाम, बिना किसी पहचान के—बस उस तस्वीर की तलाश में जो अब उसके ख्वाबों की गली बन चुकी थी।
अध्याय 4: अधूरी तस्वीरें
राधा के लिए वो मुलाकात अब एक स्मृति नहीं, एक अनुभव बन चुकी थी—जैसे उसकी पेंटिंग्स में अचानक कोई नई रेखा जुड़ गई हो जो बाकी रंगों को और गहरा कर देती है। मगर उस रेखा के साथ-साथ कुछ पुरानी दरारें भी उभर आईं जिनसे वह अक्सर नज़र चुरा लिया करती थी। उस शाम जब उसने अपनी अलमारी से वह पुराना स्केचबुक निकाला, जिसमें कॉलेज के दिनों की शुरुआती पेंटिंग्स थीं, उसकी अंगुलियाँ थोड़ी थरथराईं। उस स्केचबुक में एक पन्ना था, जिसके नीचे लिखा था—”राधा वर्मा: कलर्स ऑफ़ कंट्रास्ट”—वह वही स्केच था जिसे उसने एक बार दिल्ली के एक आर्ट इंस्टिट्यूट में भेजा था। उसका सपना था कि उसकी कला भी किसी आर्ट गैलरी की दीवार पर टंगे, कोई उसे समझे, कोई उसकी खामोश रेखाओं में कहानी देखे। लेकिन जवाब में आया था एक छोटा-सा ईमेल—“अभी आपकी कला अपरिपक्व है, इसमें बाज़ार की समझ नहीं है।” और बस वही दिन था जब राधा ने अपनी पेंटिंग्स को केवल दीवारों और अपने कमरे तक सीमित कर दिया था। अब जब दृशान जैसे किसी ने उसके चित्रों में भावनाएं खोजीं, तो वह भय और आशा के बीच झूलने लगी थी। क्या वाकई कोई उसकी कला को महसूस कर सकता है? या यह फिर से वही उम्मीद का धोखा है? उस रात राधा बहुत देर तक अपनी खाली कैनवस को देखती रही, जैसे इंतज़ार कर रही हो कि कोई रंग पहले खुद बोल उठे। उसकी उंगलियां ब्रश तक तो पहुँचीं, मगर कुछ बनने से पहले ही रुक गईं। डर था—उस अधूरेपन का, जिसे उसने सालों से छुपा रखा था।
दूसरी ओर दृशान भी उस मुलाकात के बाद बदल रहा था, लेकिन उसका बदलाव कहीं ज़्यादा भीतर से था। वह झाँसी में कैमरे के पीछे खड़ा ज़रूर था, मगर उसकी नज़र अब विषयों की तलाश नहीं कर रही थी, बल्कि भावनाओं के सिरों को पकड़ने की कोशिश कर रही थी—ठीक वैसे जैसे वह कभी खुद से किया करता था। एक दोपहर जब वह होटल के कमरे में अपने पुराने प्रोजेक्ट्स देख रहा था, तो उसकी स्क्रीन पर एक पुरानी तस्वीर रुकी—उसकी मां की, जो उसने अपनी आखिरी बीमारी के दौरान खींची थी। उसकी आंखों में एक नमी थी, और दृशान को वह दिन याद आया जब अस्पताल के बरामदे में उसने पहली बार तय किया था कि वह लोगों के जीवन को कैमरे में कैद करेगा—लेकिन तब से आज तक वह भावनाओं से दूर हो गया था, और सिर्फ फ्रेम्स में जी रहा था। राधा से मिलकर उसमें जैसे कोई पुरानी जड़ फिर से हरकत में आई हो, कोई खोया हुआ रंग फिर से तस्वीर बनने लगा हो। वह खुद को बदलते देख रहा था, और यह बदलाव उसे भयभीत भी करता था। क्या वह सचमुच उस लड़की की सादगी और गहराई में कुछ ढूंढ़ रहा है, या सिर्फ अपनी अधूरी तस्वीरों में एक रंग भरने की कोशिश कर रहा है? वह जानता था कि राधा किसी आम कहानी की नायिका नहीं थी, वह एक सजीव चित्र थी, जिसे समझने के लिए सिर्फ आंखें नहीं, आत्मा चाहिए थी। इसलिए जब उसने अगली सुबह राधा को एक मैसेज भेजा—“क्या मैं तुम्हारे आर्ट स्पेस को एक बार फिर देख सकता हूं?”—तो वह पूरी तरह तय नहीं था कि वह क्या ढूंढ़ रहा है, लेकिन इतना ज़रूर जानता था कि वह फिर से देखना चाहता है… शायद खुद को, शायद राधा को, या शायद उस अधूरी तस्वीर को जो दोनों के बीच धीरे-धीरे पूरी हो रही थी, लेकिन बिना किसी नाम के।
अध्याय 5: ख्वाबों की गली
झाँसी की गलियों में वो दोपहर कुछ अलग थी—न ज्यादा धूप, न ज्यादा साया—बस एक हल्की सी हवा जो जैसे हर पुराने घर की दीवारों से कोई दबी हुई बात निकालने की कोशिश कर रही थी। राधा ने जब दृशान का मैसेज पढ़ा तो कुछ पल चुपचाप खड़ी रही, जैसे शब्दों को पूरी तरह महसूस कर लेना चाहती हो। उसने ‘हाँ’ नहीं लिखा, लेकिन उसका दरवाज़ा उस दिन खुला ही रह गया, और उसकी खिड़की की परछाई से आते रौशनी के टुकड़े कमरे में बिखरे हुए थे। जब दृशान पहुँचा, तो राधा उस खिड़की के पास बैठी थी—कोई ब्रश हाथ में नहीं था, कोई कैनवस भी सामने नहीं, बस एक मौन जो किसी आने वाले संवाद की प्रतीक्षा कर रहा था। दृशान चुपचाप कमरे में दाख़िल हुआ, उसकी नज़र हर उस चीज़ पर ठहरती गई जिसे राधा ने अपनी आत्मा से सजाया था—कांच की बोतलों में भरे हुए रंग, पुराने अख़बारों पर उकेरे गए स्केच, दीवार पर चिपके हुए अधूरे नोट्स। और फिर उसने देखा, एक पेंटिंग जो अब तक उसने नहीं देखी थी—एक गली, जिसके दोनों तरफ झुकी हुई छतें थीं, और बीच में खड़ी एक लड़की, जिसके चेहरे पर न आँखें थीं, न मुंह—सिर्फ एक खामोश आकृति। “ये ख्वाबों की गली है,” राधा ने पहली बार बिना पूछे कहा। दृशान ने कुछ नहीं पूछा, उसने बस उस चित्र को देखा, जैसे वह उसकी कहानी को अपनी आंखों से पढ़ रहा हो। “ये वो जगह है जहाँ मैं जाती हूं, जब सब बंद हो जाता है,” राधा ने जोड़ा, “जहाँ कोई नहीं होता, सिर्फ मैं और मेरी कल्पना।”
दृशान ने धीरे से कहा, “मैं उस गली में पहुँचना चाहता हूं।” ये शब्द सुनकर राधा ने पहली बार उसकी तरफ देखा, सीधे, गहराई से। वहाँ कोई प्रेम का दावा नहीं था, न कोई आकर्षण का छलावा—बस एक जिज्ञासा, एक अनुरोध, जो आत्मा से निकला था। उस शाम, राधा ने एक पुराना कैनवस निकाला और उसे दृशान की तरफ बढ़ा दिया। “इसे पूरा करो,” उसने कहा। दृशान चौंका, “मैं तो चित्रकार नहीं हूं।” राधा मुस्कराई, “तुम्हारी तस्वीरों में जो अधूरा है, वो इस कैनवस में पूरा होगा।” दृशान ने कांपते हाथों से ब्रश पकड़ा, और पहली बार उसकी उंगलियों ने वो किया जो अब तक कैमरा करता आया था—किसी एहसास को थामना। राधा उसकी हर हरकत को देख रही थी, लेकिन टोक नहीं रही थी। शायद वह जानती थी कि जब कोई अपनी आत्मा से कुछ रचता है, तो उसे किसी दिशा की नहीं, बस विश्वास की ज़रूरत होती है। उस दिन वे दोनों एक नई शुरुआत कर रहे थे—एक गली के दो छोरों से आते हुए, एक साझा रंग खोजने की कोशिश में। जब सूरज ढलने लगा, तो कैनवस पर अब एक झुकी हुई लड़की की जगह दो आकृतियाँ थीं—एक झुकी हुई, एक सीधी खड़ी, और उनके बीच एक दरवाज़ा—खुला हुआ। राधा ने हल्की सांस ली और बुदबुदाई, “शायद अब ख्वाबों की गली में कोई और भी है…” और दृशान ने बिना कुछ कहे अपना कैमरा रखा, उस क्षण को न कैद किया, न चुराया—बस उसे जिया, पूरी तरह, पहली बार बिना लेंस के।
अध्याय 6: एहसास के किनारे
झाँसी की वो शाम जब धीरे-धीरे हल्के जामुनी रंग में ढल रही थी, राधा की खिड़की से आती हवा में कोई नई मिठास थी, जैसे कमरे की दीवारें भी जान गई हों कि अब यहाँ अकेलेपन की आदत नहीं रही। दृशान के साथ बिताए उन कुछ दिनों में जैसे राधा ने एक अलग ही भाषा में जीना सीख लिया था—जिसमें शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, सिर्फ नज़रों, रंगों और सन्नाटों के बीच बहती हल्की मुस्कानें ही सब कुछ कह जाती थीं। वह अब दिन की शुरुआत कैनवस की ओर देखने से नहीं, बल्कि दृशान की किसी नई बात को दोहराने से करती—जैसे “हर तस्वीर की आवाज़ होती है, सुन सको तो सुनो…”। उस दिन राधा ने कुछ अलग करने की सोची। उसने एक नई पेंटिंग शुरू की—जिसमें कोई रंग नहीं था, सिर्फ काले, भूरे और सफेद स्ट्रोक्स थे। ये उसकी पहली मोनोक्रोम पेंटिंग थी—और विषय था ‘ख़ामोशी’। चित्र में एक कैमरा था, जो लेंस के भीतर खुद एक आँख जैसा दिखता था—और उस आँख में राधा ने खुद को चित्रित किया था, अधूरे आकार में। जब दृशान ने यह चित्र देखा, वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला—”तुमने मुझे बना दिया है, पर अपने भीतर समेट कर। क्या मैं वाकई तुम्हारी नज़रों में ऐसा ही हूं?” राधा ने पहली बार उसे आंखों में देखा और कहा, “तुम वही हो जो मुझे देखने के लिए देख रहे हो, बाक़ी दुनिया बस तस्वीर खींचती है।”
उन शब्दों ने दृशान को भीतर तक छू लिया। उसने कैमरा उठाया और राधा की उस पेंटिंग को, बिना किसी एंगल बदले, बस वैसे ही कैद किया—जैसे वह हमेशा की तरह कैनवस पर नहीं, बल्कि किसी एहसास के किनारे खड़ी हो। वे दोनों अब बातों से ज़्यादा चुपियों में एक-दूसरे को महसूस कर रहे थे। राधा को कभी-कभी डर लगता था—कि कहीं ये सब भी एक सपना न हो, जो किसी सुबह टूट जाए। मगर फिर दृशान की मौजूदगी, उसकी संवेदनशीलता, और उसका कुछ न कहकर सब कुछ कह देना, उसे भरोसा देता। एक दिन, दृशान ने उसे बताया कि एक बड़ा आर्ट और फोटोग्राफी फेस्टिवल दिल्ली में होने वाला है, और वह चाहता है कि राधा अपनी पेंटिंग्स के साथ उसमें हिस्सा ले। राधा हँसी, लेकिन उसमें एक झिझक थी—जैसे कोई पंछी जो उड़ना चाहता है पर अपने पंखों की मजबूती पर विश्वास नहीं कर पा रहा हो। “अगर मैं वहां गई, और किसी ने मेरी पेंटिंग्स को फिर ‘परिपक्व नहीं’ कहा तो?” वह बोली। दृशान ने धीमे से उसका हाथ पकड़ा और कहा, “अब तुम एक पेंटिंग नहीं, एक पूरी गली हो—ख्वाबों से भरी, और उनमें कोई न कोई जरूर घर ढूंढ़ लेगा।” यह शब्द राधा को भीतर तक छु गए। उस दिन उन्होंने साथ में एक और पेंटिंग बनाई—इस बार कैनवस पर दो हाथ थे, एक रंगों से सना, एक कैमरे की पकड़ में, और दोनों के बीच एक रेखा—जो अब टूटती नहीं थी, सिर्फ जुड़ती जाती थी। जैसे दो आत्माएं धीरे-धीरे एक ही किनारे की तरफ बढ़ रही थीं—जहाँ शब्दों की नहीं, सिर्फ एहसास की ज़रूरत थी।




