वसुंधरा देशमुख
मुंबई की सुबह हमेशा की तरह व्यस्त और शोरगुल से भरी थी, लेकिन नीरा के दिल में एक गूंजती सी ख़ामोशी थी, जैसे किसी पुराने मंदिर की घंटी जो वर्षों से नहीं बजी हो। रेलवे स्टेशन की भीड़ से होते हुए वह अपने ट्रॉली बैग को धीमे-धीमे खींचती हुई प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ी। बालों की सफेदी अब काले रंग को पछाड़ चुकी थी और आँखों के नीचे की झुर्रियाँ समय के थपेड़े का सबूत थीं। वह साधारण सी सूती साड़ी में थी, बिना मेकअप, बिना कोई अतिरिक्त तैयारी — जैसे यह यात्रा उसके जीवन का कोई खास हिस्सा नहीं बल्कि एक मजबूरी हो। पर अंदर ही अंदर यह उसके लिए कुछ और था। यह पहली बार था जब वह अपने पति शेखर के बिना कहीं जा रही थी, पहली बार अकेले इतने लंबे सफर पर निकल रही थी। बेटे निखिल ने उसे रोका भी नहीं, सिर्फ इतना कहा, “माँ, फोन चार्ज रखना, लोकेशन ऑन रखना, और किसी से ज़्यादा बात मत करना।” यही सबक था जो नई पीढ़ी ने बुज़ुर्गों को दिया था — सतर्क रहो, लेकिन अकेले रहो। नीरा ने धीमे से सिर हिलाया और ट्रेन के डिब्बे की ओर कदम बढ़ाए। गोवा से मंगलुरु तक का टिकट उसने खुद बुक किया था, ऑनलाइन। एक लंबी यात्रा — समुद्र, पहाड़ और हरियाली के बीच। पर इस बार वह किसी को दिखाने नहीं जा रही थी कि क्या देखा, उसने यह यात्रा खुद को ढूंढने के लिए तय की थी।
वो सीट पर बैठते ही खिड़की के पार देखने लगी। स्टेशन की रेलिंग, बाहर भागती भीड़, बेचते चाय वाले, सब कुछ उतना ही परिचित था जितना अजनबी। ट्रेन धीरे-धीरे सरकने लगी और प्लेटफॉर्म पीछे छूटने लगा — ठीक वैसे ही जैसे उसकी पुरानी ज़िंदगी एक बार फिर पीछे छूटने को थी। जब शेखर थे, तब सफर हमेशा दो लोगों का होता था। उनके बैग अलग हो सकते थे, पर गंतव्य हमेशा एक होता था। अब गंतव्य तो वही था, लेकिन यात्रा अकेली पड़ गई थी। नीरा की आँखें नम थीं, पर वो रो नहीं रही थी। आँसू बहाने की आदत उसने पति की मृत्यु के कुछ महीनों बाद ही छोड़ दी थी — जब सब रिश्तेदार चले गए, बेटे ने फिर से काम में खुद को व्यस्त कर लिया, और वो एक पुराने अलमारी की तरह कोने में खड़ी हो गई। अकेलापन उसे काटने लगा था, पर उसी अकेलेपन में एक दिन उसने इंटरनेट पर कोंकण रेलवे की एक वीडियो देखी — हरे पहाड़, सुरंगें, झरने, और समुद्र किनारे चलती ट्रेन। न जाने क्यों, उस ट्रेन को देखकर उसके भीतर कुछ हिला था। शायद वही था जो उसे यहाँ तक लाया। ट्रेन अब तेजी से हिल रही थी, एक लय में — जैसे कोई शांत सा संगीत। खिड़की के बाहर अब शहर की इमारतें कम होती जा रही थीं और हरियाली अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगी थी। नीरा ने पर्स से एक छोटा थर्मस निकाला — घर से बनाया अदरक वाली चाय — और एक घूँट लिया। चाय फीकी थी, पर मन को राहत दे रही थी। उसकी उंगलियाँ कप के चारों ओर जैसे किसी गर्मी की तलाश में लिपटी हुई थीं, ठीक वैसे ही जैसे वह इस यात्रा में किसी भावनात्मक गर्माहट की तलाश में थी।
नीरा की सोच का कारवां पुरानी यादों की पगडंडी पर चलने लगा — शादी के बाद की पहली यात्रा, जब वो और शेखर शिमला गए थे; उस समय की खिड़की से भी ऐसे ही हरियाली दिखती थी, और शेखर ने मुस्कुराकर कहा था, “देखो, ये पेड़ जैसे हाथ हिला रहे हैं, जैसे कह रहे हों — वेलकम मिसेज़ राणे।” नीरा की मुस्कान उस वक़्त खिली थी, और आज भी उस स्मृति में थोड़ी सी आभा थी। लेकिन अब कोई हाथ नहीं हिला रहा था, कोई स्वागत नहीं कर रहा था। फिर भी ट्रेन की गति में, पहाड़ियों की छाया में, एक आत्मीयता सी थी — जैसे प्रकृति ही अब उसका साथी बनने को तैयार थी। पास वाली सीट अभी खाली थी, और वो सोचने लगी कि क्या कोई साथ बैठेगा? क्या कोई अजनबी इस सफर में उसके मौन को समझ पाएगा? पर फिर मन ने झिड़का — “ये कोई फिल्म नहीं, नीरा। यह ज़िंदगी है, जिसमें हर सफर का मकसद कहानी नहीं होता।” लेकिन इसी सोच में डूबे हुए भी उसे यह एहसास हुआ कि यह सफर, शायद पहली बार उसके लिए ही था — न पत्नी के रूप में, न माँ के, न किसी बहू या सास के रूप में — बस एक स्त्री, जो अकेली है, अधूरी है, और शायद खुद को फिर से पूरा करना चाहती है। बाहर सूरज धीरे-धीरे झाँक रहा था, खेतों के बीच से ट्रेन निकलती जा रही थी, और नीरा खामोशी से इस यात्रा की शुरुआत को अपने भीतर समेटती जा रही थी — जैसे कोई बीज मिट्टी में पहली बार अपनी जड़ें फैलाता है।
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ट्रेन अब शहर की सीमाओं से बाहर निकल चुकी थी। खिड़की के बाहर बदलते दृश्य किसी चलचित्र की तरह नीरा की आंखों के सामने बह रहे थे। हरियाली की इतनी परतें उसने बहुत सालों बाद देखीं थीं—कहीं गहरे हरे आम के पेड़, कहीं नारियल के झुंड, और कहीं लाल मिट्टी से भरे खेत जिनके बीच-बीच से झरने बह रहे थे। पहाड़ियों के बीच से झांकता आसमान कभी नीला तो कभी हल्का सफेद हो जाता। नीरा को लगा जैसे हर दृश्य उसके भीतर के किसी सूखे हिस्से को स्पर्श कर रहा हो। खिड़की से आती हवा में समुद्र की नमी थी, और खेतों की सौंधी गंध। नीरा ने खिड़की के शीशे पर हल्की हथेली रख दी—जैसे इस दृश्य को अपने स्पर्श से पकड़ना चाहती हो। उसके मन में अब उतनी घबराहट नहीं थी जितनी स्टेशन पर थी। ट्रेन की लयबद्ध आवाज़, धीमी झटकों के साथ उसकी गति और बाहर की शांति — ये सब उसे भीतर तक छू रहे थे। जैसे कोई पुराना सा सुर लौट आया हो, जो बरसों से गुम था।
नीरा के पास एक पुरानी डायरी थी, जिसे वह हर यात्रा में साथ रखती थी — पहले शेखर के लिए कविताएँ लिखती थी, फिर बेटे की यादों को दर्ज करती रही। लेकिन पिछले कई सालों से पन्ने खाली ही थे। आज बहुत दिनों बाद उसका मन हुआ कि कुछ लिखा जाए। उसने बैग से पेन निकाला और लिखा— “मैं आज अकेली हूँ, लेकिन पहली बार यह अकेलापन मुझे डर नहीं लगा रहा। बाहर की हरियाली, इस ट्रेन की धड़कन और इस खिड़की से दिखता आकाश — सब मेरे अपने से लगने लगे हैं।” वह रुक गई और खुद से मुस्कुरा पड़ी। वही मुस्कान जो कभी शेखर के मजाकों पर आती थी, अब ट्रेन के एक दृश्य पर आ गई थी — यह नीरा के लिए एक नई बात थी। थोड़ी देर बाद ट्रेन एक लंबी सुरंग में घुसी। अंधेरा हुआ, और डिब्बे की बत्तियाँ जल उठीं। सुरंग की आवाज़ एक अलग ही संगीत थी — गूंजती हुई, रहस्यमयी। नीरा को यह सुरंग किसी दुःख की तरह लगी — जो अचानक आता है, थोड़ी देर के लिए सब कुछ ढक लेता है, और फिर जैसे ही बाहर निकलो, रौशनी फिर से स्वागत करती है।
सुरंग से निकलते ही ट्रेन एक पुल पर आई, नीचे एक चटकती नीली नदी बह रही थी और उसके दोनों किनारों पर चावल के खेत फैले हुए थे। नीरा ने खिड़की से सिर थोड़ा बाहर निकाला — तेज हवा उसके बालों में घुस गई। एक पल के लिए उसे लगा जैसे कोई उसे पुकार रहा हो — नहीं कोई इंसान नहीं, बल्कि यह पूरी प्रकृति उसे बुला रही थी, उसके भीतर की खाली जगहों को भरने के लिए। ट्रेन की रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई, किसी छोटे स्टेशन पर रुकने वाली थी। नीरा ने खिड़की से झाँक कर बोर्ड पढ़ा — “कांकवली।” स्टेशन छोटा था, लेकिन सजीव — जैसे हर यात्री अपने में कोई कहानी समेटे चल रहा हो। नीरा ने अपनी सांस गहरी भरी, और पहली बार दिल से सोचा — “शायद यह सफर सिर्फ एक गंतव्य नहीं, बल्कि मेरी वापसी है — अपने आप तक।” वह फिर से खिड़की की ओर देखने लगी, बाहर बहते खेतों के बीच, कहीं बहुत भीतर, एक नई नीरा जन्म लेने लगी थी।
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ट्रेन जब कांकवली स्टेशन से चली, तब नीरा फिर से अपनी खिड़की की दुनिया में लौट आई थी — लेकिन तभी किसी ने पास वाली सीट पर धीरे से बैग रखा और बैठने के लिए अनुमति मांगी। नीरा ने सिर घुमाकर देखा — एक बुज़ुर्ग महिला, साँवला चेहरा, माथे पर लाल बिंदी, हाथों में चूड़ियाँ और चेहरे पर एक स्थायी मुस्कान। उन्होंने मुस्कराकर कहा, “थोड़ा वजन है बेटा, पैर दर्द करता है, खिड़की चाहिए थी पर मिली नहीं।” नीरा ने तुरंत बैग हटाया और कहा, “आप बैठ जाइए।” दोनों महिलाओं की आँखें कुछ देर एक-दूसरे को परखती रहीं — जैसे जीवन के दो अलग-अलग समय बिंदु एक ही पटरियों पर मिल रहे हों। थोड़ी देर तक खामोशी छाई रही, लेकिन जैसे ही ट्रेन फिर से सुरंग में घुसी, अंधेरे में शैला अम्मा की आवाज़ गूंजने लगी — “मुझे हर बार सुरंग से डर लगता था, अब नहीं लगता। लगता है जैसे जिंदगी खुद ही एक लंबी सुरंग है — पर बाहर रौशनी ज़रूर होती है।” नीरा चौंकी — यह बात उसने भी अभी थोड़ी देर पहले खुद से कही थी। उसे लगा, शायद यह संयोग नहीं था कि ये दोनों महिलाएँ इस सफर में साथ बैठी हैं।
शैला अम्मा बातूनी थीं, लेकिन उनके बातों में जीवन का अनुभव ऐसे बिखरा था जैसे समोसे में भरा आलू — चटपटा, परिचित और कभी-कभी गरम। उन्होंने बताया कि वे मंगलुरु जा रही हैं, अपने पोते के मुंडन संस्कार के लिए। “बेटा बहू दोनों कामकाजी हैं, मैं गोवा आई थी थोड़े दिन पोते को संभालने — अब वापस जा रही हूँ।” फिर उन्होंने धीमे से पूछा, “और तुम? अकेली जा रही हो?” नीरा कुछ पल चुप रही, फिर सिर हिलाया, “हाँ, अकेली। बस… थोड़ा बदलना चाहती थी माहौल।” शैला अम्मा ने कोई सवाल नहीं पूछा, न कोई सलाह दी। बस मुस्कुराकर बोले, “ठीक करती हो। जिंदगी जब खामोश हो जाए, तो पटरियों की आवाज़ सुननी चाहिए।” नीरा हँस पड़ी — सालों बाद किसी अजनबी ने इतनी सहजता से उसकी चुप्पी को मान्यता दी थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला चल पड़ा। शैला अम्मा ने अपने पुराने समय की ट्रेन यात्राओं के किस्से सुनाए — जब खाना स्टील के डिब्बों में भरकर ले जाया जाता था, जब हर स्टेशन पर चाय का स्वाद बदलता था, और जब लोग अजनबियों से भी अपने बच्चों की शादियों के रिश्ते तय कर लेते थे।
ट्रेन बाहर फिर से हरियाली के बीच चल रही थी, और अब नीरा को खिड़की से ज़्यादा दिलचस्पी अम्मा की बातों में थी। उनके चेहरे की झुर्रियाँ जैसे हर बात के साथ एक किस्सा खोल रही थीं — कभी हँसी, कभी आँसू, और कभी वो अधूरी कहानियाँ जो बुज़ुर्गों के दिल में दब जाती हैं। नीरा ने महसूस किया कि शैला अम्मा के साथ बैठकर उसे पहली बार एहसास हुआ — अकेलेपन का इलाज हमेशा शब्द नहीं होते, कभी-कभी बस किसी की मौजूदगी ही काफ़ी होती है। अम्मा ने नीरा के हाथ में बँधी चूड़ियों की तरफ इशारा कर कहा, “सुंदर हैं… लेकिन तूने खुद को बहुत छुपा रखा है। अब थोड़ा मुस्कुरा, बेटा। वरना ये रास्ते भी थक जाएंगे तुझे ढोते-ढोते।” नीरा ने फिर से वही पुरानी डायरी निकाली, और एक शब्द लिखा — शैला। जैसे कोई पुराना रिश्ता नया नाम लेकर लौट आया हो।
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कोंकण रेलवे की विशेषता ही यही थी — हर कुछ किलोमीटर पर एक सुरंग। और हर सुरंग के भीतर कुछ ऐसा था जो बाहर की दुनिया से बिल्कुल अलग लगता — जैसे एक अस्थायी अंतराल जहाँ समय थम जाता हो। नीरा ने महसूस किया कि जैसे-जैसे ट्रेन अंधेरे सुरंगों में प्रवेश करती, वैसे-वैसे उसके मन के भीतर की परतें भी खुलने लगतीं। हर बार अंधेरा आता, तो आँखें बंद करने की बजाय वह उन्हें खोलकर देखने लगी थी — उस घुप्प अंधेरे में जहाँ सिवाय अपनी ही साँसों के कुछ सुनाई नहीं देता था। बाहर से आने वाली रौशनी जब सुरंग में प्रवेश करती, तो वह किसी आश्वासन की तरह लगती — कि ये अंधेरा स्थायी नहीं है। एक लंबी सुरंग से गुजरते वक्त, नीरा की सांस थमी-थमी सी हो गई। अजीब सा भारीपन उसके सीने पर बैठ गया — जैसे कोई पुरानी स्मृति, कोई भूला हुआ दृश्य अचानक वापस लौट आया हो। उसे शेखर की मौत का दिन याद आया — वह अस्पताल की ICU के बाहर अकेली बैठी थी, जैसे अब ट्रेन के डिब्बे में थी। बाहर डॉक्टरों की फुसफुसाहटें थीं, भीतर मशीनों की चीख। और फिर एकदम सन्नाटा। ठीक वैसे ही जैसे सुरंग में आने से पहले होता है — एक खामोशी जो सब कुछ लील जाती है।
सुरंग खत्म हुई और बाहर तेज़ धूप के साथ समुद्र का किनारा दिखाई दिया — ट्रेन अब अरब सागर के बिलकुल करीब से गुजर रही थी। खिड़की के बाहर लहरें चट्टानों से टकरा रही थीं, और हर टकराव के साथ एक नये संगीत का जन्म हो रहा था। नीरा ने उस दृश्य को देखा तो उसकी आँखें भर आईं — जैसे रौशनी ने अंधेरे को धो डाला हो। उस क्षण उसे समझ में आया कि जीवन में भी कुछ अंधेरे सुरंगें ज़रूरी होती हैं — ताकि जब हम बाहर निकलें, तो रौशनी का महत्व महसूस हो सके। शैला अम्मा, जो तब तक चुपचाप अपने बिस्किट खा रही थीं, बोलीं, “ये सुरंगें ना… बहुत कुछ सिखाती हैं। मैंने अपने पति को खोया था तब पहली बार ट्रेन में बैठकर गोवा आई थी। जब ये सुरंगें आईं, तो डर लगा था। लेकिन अब लगता है कि सुरंग के बाद जब बाहर निकलो, तो जो दिखता है… वो सब्र का इनाम होता है।” नीरा ने उनकी ओर देखा, और चुपचाप सिर हिला दिया — अम्मा की बातें अब अनुभव नहीं, उसका हिस्सा बन रही थीं।
ट्रेन अब एक छोटे से गांव के पास से गुजर रही थी — बच्चे ट्रैक के पास खड़े हाथ हिला रहे थे, कुछ कुत्ते धूप सेंक रहे थे और नारियल के पेड़ लहरों की दिशा में झूल रहे थे। नीरा को लगा जैसे सब कुछ उसका स्वागत कर रहा हो — वह जो अब तक अपने दुख में खुद को अजनबी मान चुकी थी, अब प्रकृति की गोद में अपने लिए एक जगह खोज रही थी। उसने अपनी डायरी में फिर लिखा — “हर सुरंग के बाद रौशनी है। और हर रौशनी, एक नई नीरा के लिए है।” अम्मा ने उसकी डायरी में झाँका, फिर हँसते हुए बोलीं, “अब तू लिखती भी है? अच्छा है… अपने मन को कागज़ पर उतारना सीख ले बेटा, तब तुझे कोई बोझ नहीं लगेगा।” नीरा मुस्कुराई — और पहली बार उसने अम्मा का हाथ थाम लिया। वो जानती थी, हर गहराई से निकलने के लिए एक हाथ चाहिए होता है — और शायद शैला अम्मा वो हाथ थीं, जो सुरंग के पार उसका इंतज़ार कर रही थीं।
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कई घंटे बीत चुके थे और ट्रेन अब पश्चिमी घाटों की ऊँचाइयों को पार कर, समुद्र से सटी एक सुरम्य घाटी में प्रवेश कर चुकी थी। दोपहर की धूप अब कुछ नरम हो चली थी और नीरा की आँखें बाहर की दुनिया में तो थीं, लेकिन मन अब शांति की एक ऐसी अवस्था में पहुँच गया था जहाँ शब्दों की कोई आवश्यकता नहीं थी। तभी अचानक एक हलचल सी हुई — एक युवक, लगभग इक्कीस-बाइस वर्ष का, लंबा-सा बैग पीठ पर टांगे, हल्की घबराहट के साथ डिब्बे में दाखिल हुआ। उसके बाल बिखरे हुए थे, और टी-शर्ट पर “I Love Mangalore” लिखा था। “आंटी, क्या 42 नंबर यही है?” उसने नीरा से पूछा। नीरा चौंकी, फिर मुस्कुराई और सिर हिलाकर सीट की ओर इशारा किया। “ओह थैंक गॉड! मुझे लगा कहीं गलत डिब्बे में आ गया हूं,” वह हँसते हुए बैठ गया और पानी की बोतल से दो घूँट लेकर लंबी सांस ली। “मैं अमन हूं… पुणे में पढ़ता हूं… अब घर लौट रहा हूं… आप?” उसने बड़े आत्मीय भाव से नीरा की ओर देखा। नीरा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “नीरा… गोवा से यात्रा शुरू की है… घूमने के लिए निकली हूं।” यह कहने में उसे खुद पर गर्व-सा महसूस हुआ — जैसे किसी परीक्षा में प्रथम आई हो।
अमन बातूनी था, लेकिन उसमें एक शिष्टता थी जो आजकल के युवाओं में कम दिखाई देती थी। वह हर बात के बीच ‘आंटी’ जोड़ना नहीं भूलता था, और उसके शब्दों में कोई दिखावा नहीं, बल्कि सच्ची मासूमियत थी। उसने बताया कि वह इंजीनियरिंग के आख़िरी साल में है, और अब तक ट्रेन से यात्रा करते हुए सैकड़ों लोगों से मिला है — लेकिन उसकी सबसे प्रिय सहयात्री उसकी दादी थीं, जो अब नहीं रहीं। “आपसे बात करके वैसा ही लग रहा है,” उसने एक बार कहा, और नीरा का दिल थोड़ी देर के लिए भर आया। अमन ने उसके लिए स्टेशन से खरीदी एक प्याली चाय और एक समोसा लाकर सामने रखा। “आज तो आप मेहमान हैं आंटी… ये कोंकण स्पेशल है,” उसने हँसते हुए कहा। नीरा ने बिना टाले वह चाय ली और पहली बार किसी अजनबी द्वारा लाया गया खाना इतने अपनापे से खाया। अमन ने अपने कॉलेज की तस्वीरें दिखाई — उसके दोस्त, लैब्स, कैंटीन की मस्ती — और नीरा को लगा जैसे वह किसी और समय में पहुँच गई हो, जहाँ उसके भी सपने नए-नए थे। ट्रेन के झटकों के बीच वे दोनों हँसी के हल्के पुल बाँधते गए — जिनमें अम्मा भी कभी-कभार अपने अनुभव जोड़ देतीं, और तीनों यात्रियों के बीच एक असामान्य सा बंधन बनने लगा।
शाम होने लगी थी और ट्रेन अब सूरज के ढलते रंगों के बीच दौड़ रही थी। खिड़की के बाहर आकाश नारंगी से हल्का गुलाबी हो चला था, और हर चीज़ जैसे किसी पुराने पोस्टकार्ड की तस्वीर बन गई थी। अमन ने नीरा से पूछा, “आंटी, आप अकेले क्यों सफर कर रही हैं? डर नहीं लगता?” नीरा कुछ क्षण चुप रही, फिर कहा, “पहले लगता था… अब लगता है कि सबसे बड़ा डर खुद से मिलने का होता है। जब वो डर खत्म हो जाए, तो बाकी सब आसान लगता है।” अमन ने सिर झुकाया, जैसे उसने कोई जीवन का पाठ सुन लिया हो। थोड़ी देर बाद उसने कहा, “एक दिन मैं भी ऐसा ही अकेला सफर करूंगा — शायद खुद को ढूँढ़ने के लिए।” नीरा हँस पड़ी — “उस दिन याद रखना, कभी खिड़की की सीट छोड़ना मत।” फिर उसने डायरी में लिखा — “कभी-कभी एक युवा की मासूमियत, बुज़ुर्ग दिल में फिर से बचपन जगा देती है।” ट्रेन अब रात की ओर बढ़ रही थी, लेकिन नीरा के भीतर जैसे कोई नयी सुबह फूट रही थी — अमन की मासूमियत, उसकी सहजता और संवाद ने नीरा को फिर से इस जीवन से जोड़ दिया था, जैसे एक नई पीढ़ी ने पुरानी को फिर से जागने का निमंत्रण दिया हो।
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ट्रेन अब कोंकण रेलवे के सबसे रोमांचक हिस्से में प्रवेश कर चुकी थी — सुरंगों और पुलों का जाल, जहाँ हर कुछ मिनटों में रौशनी अंधेरे में बदल जाती थी। नीरा की खिड़की से आती हवा अब नम और ठंडी हो गई थी, और जैसे ही ट्रेन किसी सुरंग में जाती, डिब्बे में बैठे लोगों की बातें थोड़ी धीमी और आत्मलिप्त हो जातीं। सुरंग का अंधेरा मानो किसी के भीतर छिपे कोनों को छू लेता हो। नीरा को याद आया— एक बार उसका बेटा कबीर बहुत छोटा था और वो दोनों दार्जिलिंग की किसी पहाड़ी ट्रेन में बैठे थे। जैसे ही सुरंग आई थी, कबीर डर के मारे नीरा की गोद में छिप गया था और कहा था, “माँ, अंधेरे में मत छोड़ना।” आज वो याद फिर से नीरा के सामने थी, सुरंग के अंधेरे से निकली और दिल की गहराइयों में चली गई। सामने बैठा रमाकांत बाबू भी शांत हो गया था, उनकी आँखें बंद थीं, जैसे वो भी कुछ महसूस कर रहे हों— कोई पुरानी याद, कोई अधूरी बात। नीरा ने उनकी ओर देखा और सोचा— शायद हर किसी की अपनी-अपनी सुरंगें होती हैं, जिनसे गुजरना ज़रूरी होता है ताकि हम फिर रौशनी में लौट सकें।
सुरंगों के बीच की रोशनी में, ट्रेन एक लंबे पुल पर से गुज़र रही थी, नीचे बहती नदी के पार नारियल के झुरमुट और दूर-दूर तक फैला कोंकण का हरा साम्राज्य दिख रहा था। नीरा को लगा जैसे प्रकृति ने किसी पुराने घाव पर मरहम रख दिया हो। उसने अपने बैग से एक पुराना स्केचबुक निकाला जो वो सालों पहले अपने पति के साथ यात्राओं में साथ लाया करती थी। बहुत समय बाद उसने उसमें कुछ रेखाएं खींचीं— एक सुरंग, एक खिड़की और एक महिला, जो खिड़की से बाहर झाँक रही थी। पेंसिल की नोक के नीचे, नीरा ने अपना चेहरा देखा— कुछ झुर्रियों वाला, लेकिन अब उसमें एक हल्की सी मुस्कान थी। तभी बगल वाली सीट पर बैठी रिया, वो कॉलेज की लड़की, धीरे से नीरा से बोली, “आंटी, आप बहुत अच्छा स्केच बनाती हैं।” नीरा ने हँसते हुए कहा, “बहुत सालों बाद हाथ चलाया है, शायद ये यात्रा ही प्रेरणा बन रही है।” रिया ने उत्साह से कहा, “आपको फिर से ड्रॉ करना शुरू करना चाहिए, ये बहुत खूबसूरत है।” नीरा को आश्चर्य हुआ— इतने सालों से किसी ने उसकी कला को न सिर्फ देखा बल्कि सराहा भी था। जैसे अंधेरी सुरंगों के बाद आई रोशनी ने उसमें कुछ और भी जगा दिया था— उसका खोया हुआ रचनात्मक आत्म।
शाम होते-होते ट्रेन एक और सुरंग से गुज़री, लेकिन इस बार नीरा को डर या अकेलापन महसूस नहीं हुआ। अंधेरा एक पल को आया, पर अब वो जानती थी कि रौशनी ज़रूर लौटेगी। रमाकांत बाबू ने अचानक नीरा से कहा, “जानते हैं, जब हम ज़िंदगी के किसी दुःखद हिस्से से गुजरते हैं, वो एक सुरंग ही तो होता है— उसमें घुसना मजबूरी होती है, पर निकलने का रास्ता भी तय होता है।” नीरा ने उनकी बात पर सिर हिलाया, और मुस्करा दी। आसपास के सहयात्रियों में अब एक आत्मीयता बन चुकी थी— जैसे सबने एक-दूसरे के मौन को भी पढ़ना सीख लिया था। ट्रेन की रफ्तार थोड़ी कम हुई, शायद अगला स्टेशन नज़दीक था। लेकिन नीरा जानती थी कि उसकी इस यात्रा की रफ्तार अब तेज हो गई है— अतीत के अंधेरों से बाहर निकलकर एक नई सुबह की ओर।
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रेल अब धीरे-धीरे करमाली स्टेशन की ओर बढ़ रही थी, और समय जैसे थम-सा गया था। खिड़की के उस पार सूरज अब भी बादलों की ओट में था, मगर उसकी किरणें अब धीरे-धीरे लौटने लगी थीं, जैसे शाम की शुरुआत एक रंगीन चित्र की तरह फैल रही हो। बाहर हरियाली अब कुछ और गाढ़ी हो चली थी, नारियल के पेड़ अब और ऊँचे लगने लगे थे, और उनके पीछे दूर तक फैली समुद्र की झलकें अब आँखों में ठहरने लगी थीं। खिड़की के पार बैठी वह बूढ़ी अम्मा जो शुरू से चुप थी, अचानक अपने कांपते हाथों से एक डिब्बा खोल बैठीं, और उसमें से घर का बना नारियल लड्डू निकालकर मुस्कुराते हुए यात्रियों की ओर बढ़ाया। उनकी मुस्कान में एक अपनापन था — जैसे रेलगाड़ी के सफर ने हम सबको एक अनकहे रिश्ते में बाँध दिया हो। तभी सामने वाली सीट पर बैठा एक छोटा बच्चा खिड़की से समुद्र की एक हल्की झलक देखकर चिल्ला उठा — “मम्मी! समुंदर!” उसकी आवाज़ में जो आश्चर्य था, वही उस यात्रा की असली आत्मा थी — वह भोला सा चमत्कार जो किसी भी क्षण को असाधारण बना देता है। सहयात्रियों के बीच अब बातचीत का सिलसिला शुरू हो चुका था — कोई अपने कॉलेज के दिनों की यादें बाँट रहा था, कोई गोवा की पिछली यात्राओं की बातें कर रहा था, और कोई अपने मन की उलझनों को हल्के शब्दों में बाँटकर थोड़ा सा हल्का हो रहा था।
जैसे-जैसे ट्रेन सिंधुदुर्ग की ओर बढ़ी, एकाएक बारिश शुरू हो गई — वह कोंकण की प्रसिद्ध, अचानक आकर भीनी छाया छोड़ जाने वाली बारिश। खिड़की के शीशे पर पानी की बूँदें एक कहानी की तरह बहने लगीं, और मन एकाएक शांत होने लगा। दृश्य अब धुंधले हो चले थे, लेकिन उनकी धुंध में एक मोहकता थी। खिड़की के बाहर दिखने वाले छोटे-छोटे गांव, छतों पर रखे पानी इकट्ठा करने वाले नीले पीले ड्रम, बच्चों का बारिश में खेलना, खेतों में काम करतीं औरतें — ये सब उस क्षण का हिस्सा बनते चले गए, जैसे यात्रा कोई फिल्म नहीं, एक चलती-फिरती जीवंत कविता बन गई हो। ट्रेन के भीतर अब पकौड़े और चाय की खुशबू फैल गई थी — कोई यात्री थैले से गरम पकौड़े निकाल रहा था, तो कोई विक्रेता अपनी आवाज़ में “चाय-चाय-चाय गरम” की रट लगाकर सबको खींच रहा था। सहयात्रियों ने एक-दूसरे को चाय ऑफर करना शुरू किया, जैसे परिचय का आदान-प्रदान अब स्वाद के साथ जुड़ने लगा हो। कोई बूढ़े दंपति बताने लगे कि उन्होंने अपनी पहली ट्रिप गोवा में की थी, और यह रेल यात्रा हर बार उन्हें जवानी की याद दिला देती है। उनका वो आपसी हँसी-मजाक, टुकड़ों में दोहराए गए किस्से, और एक-दूसरे की कमज़ोर याददाश्त पर हँसना — सबने वातावरण को और आत्मीय बना दिया।
अब जब रात धीरे-धीरे उतरने लगी थी, ट्रेन सावंतवाड़ी स्टेशन के पास थी, और अँधेरे में कोंकण की पहाड़ियाँ किसी विशाल छाया की तरह दिखाई देने लगी थीं। बाहर की रोशनी मद्धम हो गई थी, और भीतर का हर चेहरा अब एक-दूसरे के अधिक करीब जान पड़ने लगा था। सहयात्रियों में अब कुछ गहरी बातचीतें शुरू हो चुकी थीं — जैसे यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की प्रक्रिया न हो, बल्कि आत्मा की यात्रा बन गई हो। वहीं एक कोने में बैठी लड़की, जो अब तक इयरफोन लगाए बैठी थी, अचानक अपनी डायरी में कुछ लिखने लगी — हो सकता है वह भी इस यात्रा के रंगों को पकड़ना चाहती हो, शब्दों में बाँधकर। एक बुजुर्ग सज्जन, जिनकी उम्र सत्तर के पार होगी, अचानक बोले — “कोंकण की यही खासियत है — यह आपकी आत्मा को धीरे-धीरे अपने रंग में रंग देता है।” उनके कहने में जो विश्वास था, वह किसी उपदेश जैसा नहीं, बल्कि अनुभव की गहराई से निकला सत्य था। खिड़की से आती ठंडी हवा और ट्रैक के नीचे से आती ‘कट-कट’ की आवाज़ ने मानो हर किसी को सम्मोहित कर दिया था। यह सफर अब एक जगह से दूसरी जगह जाने का माध्यम नहीं, बल्कि एक साझा अनुभूति बन गया था — जिसमें हर दृश्य, हर आवाज़, और हर मुस्कान एक यादगार हिस्सा बन चुकी थी।
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