विपुल शर्मा
भाग 1: बुआ का एलान
बिल्लूपुर की सुबहें आमतौर पर कबूतरों की गुटरगूँ, चाय की पहली चुस्की, और दूधवाले की साइकिल की घंटी से शुरू होती थीं। लेकिन उस दिन की सुबह कुछ अलग थी। गाँव के मंदिर के सामने चौपाल में, नीम के नीचे बैठी कांता बुआ ने एक ज़ोरदार चाय की चुस्की लेकर जैसे ही गिलास रखा, वैसे ही उनकी आवाज़ पूरे गाँव में गूँज गई—
“इस साल हम कन्याकुंभ में जाएँगे!”
चारों तरफ सन्नाटा।
गुड्डू, जो बुआ का भतीजा और स्थानीय सरकारी दफ्तर में बाबू था, अपने अख़बार के पीछे छिपते हुए बड़बड़ाया—
“लो! फिर शुरू हो गई बुआ की कोई नई योजना!”
पिंकी, गुड्डू की बेटी, जो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की टॉपर थी, कान में ईयरफोन डाले मोबाइल पर रील देख रही थी। बुआ की आवाज़ सुनते ही उसने मोबाइल नीचे रखा—
“कन्याकुंभ? वो क्या होता है, बुआ?”
बुआ ने आंखे तरेरीं, पंखा झलते हुए बोलीं,
“बेटी, ये आजकल के जमाने में सिर्फ रील देखने से ज्ञान नहीं आता! कन्याकुंभ है औरतों का महा-मेला! वहाँ नाच-गाना भी होता है, पर सबसे ज़रूरी – औरतों की आज़ादी की चर्चा होती है। और हम भी जाएँगे, पूरे गाँव की महिलाओं को लेकर।”
लल्ला यादव, जो हमेशा अपने रिक्शे पर तैयार खड़ा रहता था, लोटपोट होकर बोला,
“बुआ, आपको ले चलेंगे तो ट्रेन में टीटी तक डर जाएगा!”
बुआ ने तर्जनी उठाकर कहा,
“डराएंगे नहीं, सुधार देंगे!”
गुड्डू ने धीरे से टोका, “बुआ, पिछले साल आप बर्फ़ी की दुकान से फिसलकर गिरी थीं, इस बार पूरा उत्तर भारत हिल जाएगा!”
बुआ ने नज़रें तरेरीं, “गुड्डू! हमें मत छेड़ो। हमारी हड्डियाँ भले सत्तर की हों, पर आत्मा अभी भी सोलह की है।”
पिंकी ने तपाक से कहा, “बुआ, चलिए! मैं आपके लिए टिकट बुक कर देती हूँ IRCTC से। स्पेशल ट्रेन चल रही है कन्याकुंभ एक्सप्रेस।”
बुआ चौंकी, “IRCTC कौन सा मंडल है?”
पिंकी मुस्कुरा के बोली, “ऑनलाइन मंडल है, बुआ। अब लोग कंप्यूटर से टिकट निकालते हैं, पंडित से नहीं।”
बुआ सोच में पड़ गईं, “अच्छा… तो अब रेल भगवान से नहीं, बिटिया से चलती है। अच्छा है!”
उसी शाम बुआ ने गाँव की महिलाओं की बैठक बुला ली। रामप्यारी, गोमती, चम्पा, सभी मौजूद थीं। मसले थे – कितने जोड़े कपड़े ले जाएँ, अचार की कितनी बोटलें रखी जाएँ, और सबसे महत्वपूर्ण – कन्याकुंभ में मंच पर नाचने के लिए कौन-कौन तैयार होगा?
गोमती बोली, “बुआ, मेरी तो कमर जवाब दे चुकी है, लेकिन जब ‘बंबई से आयी बहार’ बजेगा, तो मेरी आत्मा खुद नाच उठेगी!”
रामप्यारी चिंतित थी, “बुआ, ट्रेन में क्या हमारी सीट पक्की मिलेगी? पिछली बार गोमती खिड़की से लटक रही थी।”
बुआ ने छाती चौड़ी की, “हम टिकट भी पक्के करवाएँगे और मेले में फोटो खिंचवाकर फेसबुक पे डालेंगे! और हाँ, टिक-टॉक भी!”
गुड्डू ने अपना माथा पीट लिया।
“बुआ अब टिक-टॉक पर भी एक्टिव हो गईं! अगला कदम है इंस्टाग्राम पर बुआ का लाइव आना!”
बुआ ने सबकी तरफ देखा और गर्जना की,
“कल से हम ‘बिल्लूपुर महिला मंडल कन्याकुंभ अभियान’ शुरू कर रहे हैं! सब तैयारी में लग जाओ! ये कोई साधारण यात्रा नहीं है – ये है ‘स्त्रीशक्ति की रेलयात्रा’!”
पिंकी ने धीरे से बुआ से पूछा, “बुआ, क्या ये यात्रा सिर्फ मेले के लिए है, या कोई और कारण भी है?”
बुआ ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, “कारण तो बहुत हैं बिटिया… कुछ पुराने, कुछ नए… लेकिन सब बताएँगे सही समय पर।”
बात हवा में तैर गई।
रात होते-होते पूरा गाँव बुआ की यात्रा के चर्चे में लग गया। मंदिर के पुजारी बोले, “बुआ का जाना शुभ संकेत है – इस बार मेले में भूतों का डर नहीं रहेगा।”
दूधवाले ने कहा, “बुआ के झोले में लोटा और लाठी के साथ-साथ फोन भी है – अब क्या राक्षस भी ऑनलाइन मिलेंगे?”
गुड्डू की हालत देखकर ऐसा लग रहा था जैसे ट्रेन में वो नहीं, उसे लादकर ले जाया जा रहा है।
“हे राम! इस बार बुआ को संभालने के लिए मुझे सरकार से अवकाश लेना पड़ेगा।”
लेकिन गाँव की औरतों में नई ऊर्जा थी। बुआ के नेतृत्व में उन्हें न केवल मेला घूमने को मिलेगा, बल्कि मंच पर बोलने, गीत गाने और शुद्ध हँसी उड़ाने का सुनहरा मौका भी।
सुबह का सूरज उगते-उगते बुआ का पहला रील तैयार हो चुका था –
“हम आ रहे हैं कन्याकुंभ – बिल्लूपुर की नारी शक्ति का धमाका! “
रील वायरल हो गया।
मिलियन नहीं, पर मोहल्ला भर व्यूज़ तो आ ही गए।
बुआ ने मोबाइल देखा और बोलीं, “चलो बिटिया, टिकट बुक करो। बिल्लूपुर की नारी क्रांति अब प्लेटफॉर्म नंबर तीन से चलेगी!”
भाग 2: बिल्लूपुर महिला मंडल की तैयारी
बुआ के कन्याकुंभ एलान के बाद से जैसे बिल्लूपुर गाँव में झंडा फहर गया हो। हर गली में महिलाएँ दुपट्टे बांधे, लोटा-कटोरी छोड़कर मोबाइल थामे घूम रही थीं। रामप्यारी की बहू, जो आमतौर पर आलू छीलते वक्त भी ऊंघती थी, अब “झूम बराबर झूम” गाने पर रील बना रही थी।
गुड्डू सरकारी दफ्तर में बैठकर फॉर्म नंबर 12B भरने की जगह अब टिकट नंबर 243-TF पर नज़र गड़ाए हुए था।
“हे भगवान! AC टूटी सीट के लिए इतनी मारामारी? और बुआ कहती हैं कि ‘हमको तो खिड़की वाली सीट चाहिए!’”
बुआ घर में पूरे उत्साह के साथ मिशन संचालन कर रही थीं। एक को कपड़े की लिस्ट लिखवा रहीं थीं, दूसरी को अचार की बॉटल गिनवा रहीं थीं। लल्ला यादव घर के बाहर अपनी रिक्शा को रंगवाकर उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवा रहा था —
“कन्याकुंभ स्पेशल – कांता बुआ एक्सप्रेस”
पिंकी, जो अब पूरे प्रोजेक्ट की सोशल मीडिया मैनेजर बन चुकी थी, बुआ के TikTok अकाउंट पर वीडियो अपलोड कर रही थी—
“देखिए बिल्लूपुर महिला मंडल की तैयारी! पार्ट-1: झोला पैकिंग से लेकर नाक की नथ तक!”
बुआ वीडियो में बोल रही थीं, “कन्याकुंभ में कोई हमारी नथ की बराबरी नहीं कर पाएगा! ये बिल्लूपुर स्टाइल है!”
रामप्यारी चिंतित होकर बोली, “बुआ, मेले में क्या साड़ी पहनें या सलवार?”
बुआ ने जवाब दिया, “साड़ी में गरिमा है, पर सलवार में गति है। गरिमा और गति का संतुलन ज़रूरी है!”
चम्पा बोली, “और बुआ, अगर वहाँ भजन प्रतियोगिता हुई तो कौन गाएगा?”
बुआ ने छाती चौड़ी कर कहा, “हमारा महिला मंडल ‘जय अंबे गौरी’ गाएगा, लेकिन remixed beat पे!”
गोमती, जो ज़रा पीछे बैठी थी, धीरे से बड़बड़ाई, “बुआ तो अंबे माता को भी DJ बना देंगी!”
गुड्डू दिन-रात यही सोच रहा था कि अब गाँव की महिलाएं मेले में जाकर क्या गुल खिलाएंगी। उसके ऑफिस के बाबू मित्रों ने कहा,
“अरे यार गुड्डू, तुम्हारे गाँव की महिलाएं मेला जाएंगी या मेला उठाकर ले आएंगी?”
गुड्डू ने सिर पकड़ लिया, “तुम नहीं जानते कांता बुआ को। वो जो ठान लेती हैं, करके दिखाती हैं – चाहे वो रेल का कोटा हो या अचार का टिन।”
इधर बुआ ने एक नया अभियान शुरू कर दिया था – ‘नारी स्वावलंबन: मेला मॉडलिंग वर्कशॉप’। इसके तहत रामप्यारी को सिखाया गया कि मंच पर कैसे चलना है, और चम्पा को सिखाया गया कि किस एंगल से सेल्फी लेना सही रहेगा।
पिंकी बोली, “बुआ, हम आपके लिए एक नया हैशटैग बना रहे हैं —
#BuaOnTheMove”
बुआ खुश हो गईं, “शानदार है बिटिया! इस पर फोटो भी डाल दो – जिसमें हम नमक की बोरियों के बीच खड़े हैं। दिखाना है कि गाँव की महिलाएं शहर से कम नहीं।”
पिंकी ने एक और सुझाव दिया, “बुआ, मेले में जाने से पहले हम सबका एक प्रोमो वीडियो बना लें, जिसमें आप सब इंट्रो दें – जैसे रियलिटी शो में होता है।”
बुआ झट तैयार हो गईं, “हाँ हाँ! हम कहेंगे – ‘हम हैं कांता बुआ, बिल्लूपुर से, और कन्याकुंभ में धमाल मचाने आ रहे हैं!’”
गुड्डू ने पीछे से धीरे से कहा, “आपका नारा हो सकता है – ‘कांता बुआ, नारी शक्ति का जुलूस!’”
बुआ ने पलटकर देखा, “जुलूस नहीं, जनआंदोलन कहो!”
पड़ोस की मुन्नी काकी, जो अब तक चुप थीं, बोलीं, “बुआ, खाने की क्या व्यवस्था होगी? हमें तो भूख जल्दी लग जाती है।”
बुआ ने कहा, “इसलिए हम लेकर चलेंगे – खस्ता कचौड़ी, सूखा आलू, मिर्च का अचार, और चने की नमकीन! और हाँ, पिंकी बताएगी कि कौन-से स्नैक्स ट्रेन में बैन हैं।”
पिंकी बोली, “बुआ, ट्रेन में सिर्फ स्मोकिंग बैन है, बाकी सब चल जाएगा – बशर्ते आप सामने वाली सीटवाले को भी खिलाएँ।”
बुआ बोलीं, “तो फिर हम प्यार से सबको खिलाएँगे और बातों से भुनाएँगे।”
शाम होते-होते मोहल्ले में ये खबर फैल गई कि बिल्लूपुर महिला मंडल पूरे धूमधाम से मेले में जाएगा – रंग-बिरंगे कपड़े, फैंसी लोटे, और मुँह में मिसाइल जैसी बातें लेकर।
गुड्डू अब आधिकारिक रूप से “यात्रा प्रभारी” बना दिया गया था – मतलब टिकट, ट्रेन का टाइम, बैग उठाने और सबसे बड़ी जिम्मेदारी – बुआ को समय पर शौचालय पहुँचाने की।
उस रात गुड्डू ने सपना देखा कि बुआ ट्रेन में टीटी से बहस कर रही हैं, “हमने खिड़की सीट बुक कराई थी, और आप हमें टॉयलेट के पास बिठा रहे हैं? ये तो नारी अपमान है!”
सपने में टीटी रोने लगा और बोला, “माफ़ करना बुआ, मैं ड्यूटी छोड़ रहा हूँ। अब रेलवे छोड़कर NGO जॉइन करूंगा!”
गुड्डू हड़बड़ाकर उठा – माथा पसीने से भीगा हुआ था।
सुबह उठते ही बुआ ने सबको बुलाकर ऐलान किया,
“बस बिटिया लोग, तैयार हो जाओ – कल से रिहर्सल शुरू! ट्रेन में चढ़ना, उतरना, टिकट दिखाना, और ज़रूरत पड़े तो बहस करना – सब कुछ सिखाया जाएगा!”
पिंकी बोली, “बुआ, मेले में अगर कोई पुरुष टोका-टाकी करे तो क्या करेंगे?”
बुआ मुस्कुराईं, “तब हम बिल्लूपुर की भाषा में जवाब देंगे –
‘हम नारी हैं, तुम्हारी नहीं, हमारी चलती है!’”
और इसी नारे के साथ बिल्लूपुर महिला मंडल की तैयारी अपने चरम पर थी।
भाग 3: ट्रेन का तमाशा
बिल्लूपुर स्टेशन वैसे तो एकदम मामूली जगह थी—एक प्लेटफॉर्म, एक चाय वाला और दो गुटखा बेचने वाले। लेकिन उस दिन स्टेशन की रौनक कुछ और ही थी।
कांता बुआ के नेतृत्व में महिला मंडल स्टेशन पर ऐसे उतरा जैसे भारत की महिला क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप जीतकर लौटी हो।
रामप्यारी के हाथ में पोटली, चम्पा के सिर पर स्टील के बर्तन से भरा झोला, गोमती के गले में पाँच नकली मोतियों की मालाएं, और बुआ… बुआ तो नीले बॉर्डर वाली लाल साड़ी में लहराती चली आ रही थीं। पिंकी ने तो मोबाइल निकालते ही कहा—
“स्टॉप! एक रील बनाते हैं – ‘बुआ एंड मंडल: ट्रेन पे चढ़ाई मिशन’”
गुड्डू पीछे-पीछे चिल्ला रहा था, “ट्रेन के डिब्बे C-3 में सीट नंबर 31 से 36 तक है! बुआ, इधर! बुआ… उधर नहीं!”
बुआ चढ़ने ही वाली थीं कि प्लेटफॉर्म पर लल्ला यादव का डायलॉग गूंजा—
“बुआ! सेल्फी तो हो जाए ट्रेन के सामने!”
बुआ ठिठकीं, बाल सहेजे, पल्लू ठीक किया, और बोलीं, “हम कोई आम मुसाफिर नहीं। हम हैं #TrainQueen।”
इतने में ट्रेन धड़धड़ाती हुई स्टेशन में घुसी और पूरा मंडल भगदड़ में बदल गया। एक महिला झोला पटकती चढ़ी, दूसरी की साड़ी प्लेटफॉर्म पर अटक गई। चम्पा की चप्पल डिब्बे के अंदर और खुद बाहर।
बुआ ने हाथ उठाकर नेतृत्व किया—“बाएं चढ़ो, दाएं घूमो, सीट पकड़ों!”
पिंकी ने जैसे-तैसे सबको उनकी-उनकी जगह बैठाया। रामप्यारी खिड़की के पास बैठते ही बोली,
“अरे वाह! हवा तो शानदार आ रही है। अब नमकीन खोलूं क्या?”
बुआ ने डांटा, “पहले हाथ धो लो! सफर की मर्यादा होती है।”
गुड्डू डिब्बे के दरवाजे पर लटकते हुए ऊपर वाले बैग रैक में सामान फंसा रहा था।
“ये बुआ का मिक्स अचार… ये गोमती की साड़ी की गठरी… ये लल्ला का पंखा… और ये क्या… हाँ! ये गोमती की हँसी मत भूलना, सबसे भारी वही है!”
इतने में सामने की सीट पर बैठे सज्जन यात्री ने मुस्कराकर पूछा,
“आप लोग कहाँ जा रहे हैं?”
बुआ तुरंत उठीं और अपना झोला संभालते हुए बोलीं,
“कन्याकुंभ! नारी सशक्तिकरण का तीर्थ!”
वो सज्जन बोले, “अरे वाह! मैं भी वहीं जा रहा हूँ। मैं तो आयोजक मंडल से हूँ।”
बुआ की आँखों में बिजली चमकी, “तो फिर हमारी टीम को मंच पर 15 मिनट दीजिएगा। हम ‘नारी जागरण लघुनाटिका’ प्रस्तुत करेंगे – ‘दहेजखोरी पे डंडा’।”
वो सज्जन कुछ बोले उसके पहले ही सामने से टीटी आ गया।
“टिकट दिखाइए!”
गुड्डू ने राहत की सांस ली, “सब तैयार है, ये लीजिए। बुआ की टिकट C-3, सीट 31।”
टीटी ने देखा, “लेकिन ये टिकट तो सीनियर सिटिज़न की है और आपके साथ चार महिलाएं और हैं… इनके क्या?”
गुड्डू सकपकाया, “वो… वो सब भी सीनियर हैं… आत्मा से।”
बुआ बीच में कूदीं, “हम सब एक ही संस्था से हैं – ‘बिल्लूपुर महिला मंडल’। हम सामाजिक कार्यकर्ता हैं। और ये टिकट हमारी गरिमा का प्रमाण है।”
टीटी कुछ कहता, उससे पहले रामप्यारी बोली, “भैया, थोड़ा खस्ता खाओ ना। खुद बनाये हैं बुआ ने।”
टीटी मुस्कराया, “ठीक है जी… यात्रा मंगलमय हो।”
गुड्डू ने माथा पीट लिया – “बुआ अब खस्ता से भी टिकट पास करवा रही हैं!”
ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी। बुआ ने चायवाले को बुलाया,
“भैया, चाय दो। थोड़ा कड़क, थोड़ा मीठा और थोड़ा गरम – यानी हमारी तरह!”
चाय आई, तो गोमती बोली, “बुआ, आपने अंडा तो पैक कराया नहीं। मेले में कहाँ मिलेगा?”
बुआ ने कहा, “अंडा नहीं, विचार ले चलो। औरत को ताकत ख्याल से मिलती है, बॉयल अंडे से नहीं।”
पिंकी खिड़की के पास बैठी Instagram Reels एडिट कर रही थी –
“बिल्लूपुर मंडल ऑन द रन #TrainQueen #KanyaKumbhExpress”
उधर लल्ला ने अपने झोले से मंजीरा निकाला और धीरे-धीरे बजाने लगा।
“बुआ, रात में भजन होगा न? हमने रिहर्सल कर रखा है – ‘ओ पालनहारे’ वाली धुन पे ‘लाल साड़ी वाली माता’!”
बुआ ने सिर हिलाया, “लल्ला, तुम संगीत की नई मिसाल हो – बेसुरे होकर भी सुर में लगते हो।”
रात होने लगी। ट्रेन की रौशनी में बुआ ने चश्मा ठीक करते हुए यात्रियों को ज्ञान देना शुरू किया –
“देखो बेटा, रेल जीवन जैसी है – भागते रहो, स्टेशन बदलते रहते हैं, और खिड़की से हमेशा कुछ नया दिखता है। बस प्लेटफॉर्म मिस न करना!”
गुड्डू ने थका-हारा कहा, “और बाथरूम हमेशा गलत तरफ होता है!”
हँसी का ठहाका पूरे डिब्बे में गूंजा।
बुआ ने सबकी चुप्पी काटते हुए ऐलान किया—
“कल सुबह हम ‘कन्याकुंभ नगर’ पहुँचेंगे। पर हमारी यात्रा सिर्फ बाहर की नहीं है… ये आत्मा के अंदर जाने का भी सफर है।”
गुड्डू ने धीरे से कहा, “और मेरे लिए, ये धैर्य की परीक्षा है।”
पिंकी ने मोबाइल घुमाते हुए कहा, “बुआ, कल सुबह कन्याकुंभ स्टेशन पर लाइव करेंगे! क्या बोलेंगी कैमरे में?”
बुआ ने मुस्कुरा कर जवाब दिया—
“बोलेंगे… ‘बिल्लूपुर की नारी सेना पहुंच गई है। और इस बार… सिर्फ फोटो खिंचाने नहीं, मंच हिलाने आई है!’”
भाग 4: मेलों में मेलो ड्रामा
सुबह के सात बजे ट्रेन ने जैसे ही कन्याकुंभ नगर स्टेशन में एंट्री मारी, बुआ ने चश्मा ठीक किया और सबसे पहले अपने होंठों पर लिपस्टिक की लकीर खींची।
“बेटा पिंकी, लाइव करो अब। हम स्लीपर से उठे हैं पर लगे VIP जैसे।”
पिंकी ने कैमरा ऑन किया और बोली,
“लाइव देखिए – बिल्लूपुर महिला मंडल के गर्जन के साथ कन्याकुंभ में प्रवेश!”
बुआ पूरे आत्मविश्वास से बोलीं, “ये धरती अब सिर्फ पुरुषों की नहीं रही। अब महिलाएं टिक-टॉक बनाकर नहीं, ताल ठोककर आई हैं!”
रेलवे प्लेटफॉर्म पर उतरते ही मंडल के चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे कोई योध्दा दल किले पर चढ़ाई करने आया हो। चम्पा के सिर पर अभी भी साड़ी की गांठ में हेडफोन लटका हुआ था, रामप्यारी का झोला उलटा था, और लल्ला अपने मंजीरे को कपड़े में लपेटे, ‘गर्भगृह के सामान’ की तरह संभाल रहा था।
बाहर निकलते ही हवा में मेले की खुशबू तैर रही थी—मिठाई की महक, चूड़ियों की छनक, और भजन मंडली की बेसुरी गूँज।
बुआ ने चारों ओर देखा, फिर घोषणा की,
“चलो महिला मंडल! ये मेला नहीं, यह हमारी परीक्षा है। औरत का असली चरित्र तब दिखता है जब सामने भूत झूला हो और जेब में सौ का नोट।”
गोमती उछली, “बुआ, झूला? क्या हम भी चढ़ सकते हैं?”
बुआ बोलीं, “जब तक रीढ़ में जान है, तब तक सब चलेगा। पर ध्यान रहे—झूले में चिल्लाना ज़रूरी है, वरना मजा अधूरा।”
बुआ ने सबसे पहले सबको लाइन में लगाकर जलेबी दिलवाई।
“बिना जलेबी खाए कोई नारी क्रांति नहीं होती। और ये जलेबी नहीं—क्रांति की मिठास है।”
तभी पास से एक सजे-धजे मंच पर अनाउंसमेंट हुआ—
“कन्याकुंभ की सबसे बहादुर महिला को मिलेगा ‘शेरनी सम्मान’!”
बुआ फौरन बोलीं, “हमारा नाम लिस्ट में जोड़ो। शेरनी तो हम पैदा ही हुई थीं। चायवाले से लेकर टीटी तक सब जानते हैं।”
पिंकी ने दौड़कर फार्म भर दिया—
“नाम: कांता देवी
गाँव: बिल्लूपुर
क्वालिफिकेशन: चार टीटी पछाड़े, एक बार साँप भगाया, और सासु-बहू विवाद सुलझाए।”
अब तक महिला मंडल अलग-अलग स्टॉलों पर बिखर गया था—रामप्यारी चूड़ी खरीदने में लगी थी, गोमती ने मेहंदी लगवा ली थी और चम्पा लाठी डांस सीख रही थी।
तभी पिंकी दौड़ते हुए आई, “बुआ! मंच से आपका नाम पुकारा गया है – फाइनलिस्ट में हैं!”
बुआ तुरंत साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए बोलीं, “चलो! बिल्लूपुर की इज़्ज़त अब हमारे बोल पर टिकी है!”
स्टेज पर पहुंचते ही बुआ ने माइक थामा और एक हाथ कमर पर रख कर कहा,
“हम सिर्फ एक महिला नहीं, हम एक आंदोलन हैं। जिसने हमारी उम्र पर शक किया, उसका चश्मा हमने खुद ठीक करवाया है। और हाँ, झूले में बैठकर डरने वालों को हम ‘बिल्लूपुर ट्रेनिंग’ देते हैं।”
भीड़ ने तालियां बजाईं।
होस्ट ने पूछा, “बुआ, आपके जीवन की सबसे बड़ी बहादुरी क्या रही?”
बुआ बोलीं, “तीन दिन बिना मोबाइल के रहना। और एक बार तो हम रिचार्ज तक भूल गए थे!”
भीड़ में ठहाके गूंजे। बुआ ने मंच को अपने भाषण से झुला दिया।
उसी शाम, महिला मंडल ‘भोजन-भंडारा’ की ओर गया, जहां पूरे मेले की सबसे लंबी लाइन थी।
गुड्डू थककर चिल्लाया, “बुआ, बैठिए अब! पेट भर गया है या और जगह देखकर जलेबी चाहिए?”
बुआ ने गंभीरता से कहा, “हमारी भूख पेट की नहीं, बदलाव की है।”
गुड्डू ने सिर पकड़ लिया, “और मेरा धैर्य अब टेस्टिंग की हद से बाहर है!”
रात को बुआ और मंडल ने जमीं पर चादर बिछाई और अपना बेस कैंप बनाया।
रामप्यारी बोली, “बुआ, आज तो दिन भर की मस्ती में नींद झपकते ही आएगी।”
लेकिन तभी मंच पर एक अनाउंसमेंट हुआ—
“सभी प्रतिभागियों को कल सुबह मंच पर विशेष प्रस्तुति देने का अवसर मिलेगा। जिनके पास कोई ‘प्रतिभा’ है, वो अभी नाम दर्ज कराएं।”
बुआ चौंकी, “प्रतिभा? अरे हममें तो छुपी हुई प्रतिभाओं का खज़ाना है!”
पिंकी फॉर्म भरने भागी।
बुआ ने कहा, “कल हम लघुनाटिका करेंगे—‘सासु माँ का अचार’, जिसमें रामप्यारी बनेगी सास और हम बहू!”
रामप्यारी बोली, “बुआ! आप बहू बनेंगी? सत्तर साल की बहू?”
बुआ ने मुस्कुरा कर कहा, “क्रांति की कोई उम्र नहीं होती।”
भाग 5: भागी हुई बुआ
कन्याकुंभ का अगला दिन सूरज की किरणों के साथ नहीं, बल्कि रामप्यारी की चीख से शुरू हुआ—
“बुआ नहीं हैं! बुआ बिस्तर पे नहीं हैं! उनका झोला भी नहीं है!”
पूरा बिल्लूपुर महिला मंडल एक सेकंड में अलार्म मोड में चला गया। चम्पा बगल के तंबू में झाँकी, गोमती ने मंच के पास देखा, लल्ला ने पास के भंडारे की तरफ दौड़ लगाई—पर बुआ का कहीं कोई अता-पता नहीं।
पिंकी की आँखें मोबाइल स्क्रीन से हट ही नहीं रही थीं।
“बुआ की लोकेशन ट्रैक कर रही हूँ… आखिरी बार उनकी WhatsApp लोकेशन रात 2:17 बजे एक्टिव थी – ‘कन्याकुंभ वाटर पवेलियन’ के पास!”
गुड्डू अपने गंजे सिर पर हाथ रखकर बैठ गया, “हे भगवान! बुआ इस उम्र में भी गूगल मैप से तेज निकलीं!”
लल्ला ने गंभीर होकर कहा, “अब क्या करें? मेला इतना बड़ा है, बुआ तो कहीं भी हो सकती हैं। कहीं कोई भूत-झूले में फँस तो नहीं गईं?”
रामप्यारी की आंखें भर आईं, “बिना बुआ के तो हमारा मंडल अधूरा है। मंच पर कौन बोलेगा ‘हम आंदोलन हैं’?”
इधर पिंकी ने झट Instagram स्टोरी डाली:
📢 बिल्लूपुर की ‘TrainQueen’ लापता!
किसी ने देखा हो तो DM करें!
#FindBua #MissingButBold
पूरे कन्याकुंभ में अफवाह फैल गई—“एक बुजुर्ग महिला लापता! नीली बॉर्डर वाली लाल साड़ी में थीं, बातों में बम, चाल में बिजली।”
मेला प्रशासन सकपका गया। अनाउंसमेंट होने लगे—
“सभी यात्रियों से निवेदन है, यदि आपने कांता देवी को देखा हो तो कृपया मंच नंबर 4 पर सूचित करें। वह महिला मंडल की नेता हैं और महिला शक्ति की मूर्तिमान मिसाल हैं।”
इसी अफरातफरी में चम्पा को एक स्टॉल से खबर मिली—“अरे, वो लाल साड़ी वाली बुआ? हाँ, वो तो सुबह-सुबह अकेले वाटर शो की तरफ जाते दिखीं।”
गुड्डू बड़बड़ाया, “अब बुआ को वाटर शो भी देखना था? कहीं नाच में कूद तो नहीं पड़ीं?”
पिंकी, जिसने अब तक एक रील भी एडिट कर ली थी, बोली, “बुआ अगर वाटर शो में गई हैं, तो जरूर किसी मिशन पर हैं।”
इधर लल्ला को याद आया, “बुआ ने पिछले हफ्ते कहा था – कन्याकुंभ में उनका एक ‘अधूरा काम’ है।”
सभी की नज़रें एक-दूसरे से टकराईं।
गुड्डू चौंका, “कहीं… बुआ का कोई पुराना लव अफेयर तो नहीं है?”
रामप्यारी हक्की-बक्की, “बुआ और प्यार? वो तो हमें अचार से ही प्यार करती थीं।”
पिंकी ने धीरे से कहा, “बुआ ने एक बार बताया था… बहुत साल पहले एक ‘रघुवीर बाबू’ थे – जिनसे उनकी शादी होने वाली थी। लेकिन बाढ़ आ गई और बारात नहीं आ पाई।”
चम्पा ने आँखें गोल कीं, “और अब बुआ बाढ़ के बदले ‘कन्याकुंभ’ में रघुवीर की तलाश में हैं?”
गुड्डू ने सिर पीटा, “मतलब बुआ ने कन्याकुंभ को Tinder बना लिया है!”
उसी शाम मंच नंबर 4 के पास बुआ की आवाज़ सुनाई दी—
“रघुवीर! तू है कि नहीं? हमने सत्तर साल तक तेरी मिठाई नहीं खाई! आज बता दे तू लड्डू है या बेसन का भूत!”
लल्ला दौड़ा—“बुआ! आप यहाँ क्या कर रही हैं?”
बुआ ने आँखें पोंछीं और बोलीं,
“हम रघुवीर को खोज रहे थे… वो कहता था कि जब तक हम कन्याकुंभ में नहीं मिलेंगे, उसका जीवन अधूरा रहेगा। और हमने वादा किया था—सत्तर की उम्र में भी आएंगे… तो आए हैं!”
पिंकी ने धीरे से पूछा, “मिला क्या, बुआ?”
बुआ ने गहरी साँस ली, “नहीं मिला… पर अपना वादा निभा दिया। कभी-कभी मिलना ज़रूरी नहीं होता, याद निभा लेना ही काफी होता है।”
सबकी आँखें नम थीं। चम्पा बड़बड़ाई, “हे भगवान, ये तो रील से भी बड़ा ड्रामा है।”
गुड्डू भुनभुनाया, “अब बताओ, इस पूरे सस्पेंस में हमारा मंच प्रस्तुति गया तेल लेने!”
बुआ ने मुस्कराकर कहा, “नहीं बेटा, मंच अभी भी हमारा इंतज़ार कर रहा है। हम वहाँ भी जाएँगे। लेकिन पहले… चलो एक कप चाय हो जाए।”
लल्ला ने चाय का ऑर्डर दिया। और सबने राहत की साँस ली।
भाग 6: गुप्त एजेंडा
चाय की पहली चुस्की के साथ जैसे कांता बुआ के चेहरे की रेखाएँ थोड़ी और मुलायम हुईं। कन्याकुंभ के मंच के शोर से दूर, सब एक किनारे बैठे थे — गुड्डू अब चुप था, पिंकी की रील रुकी हुई थी, और बाकी महिला मंडल बुआ के चेहरे को ऐसे देख रहा था जैसे कोई पुरानी कहानी की किताब खुलने वाली हो।
रामप्यारी ने धीरे से पूछा, “बुआ, सच-सच बताओ… ये रघुवीर बाबू कौन थे? और आप इतने सालों बाद उन्हें क्यों खोज रही थीं?”
बुआ ने चश्मा नीचे उतारा, पंखा समेटा, और नज़रों को आसमान की ओर टिकाकर कहा,
“रघुवीर… वो सिर्फ एक नाम नहीं था। वो एक वादा था। एक चिट्ठी थी जो डाक में कभी नहीं आई… एक बारात थी जो बाढ़ में बह गई।”
गुड्डू बुदबुदाया, “और हमारी ट्रेन उस वादे के ट्रैक पर उतर गई।”
बुआ ने मुस्कुरा कर कहा, “सुनो सब। सन् 1971… मैं सोलह की थी, रघुवीर अट्ठारह का। वो हमारे गाँव आया था अपने चाचा के घर गर्मी की छुट्टियों में। बहुत शालीन, पढ़ाकू लड़का… और थोड़ा शर्मीला भी।”
चम्पा बीच में बोल पड़ी, “तो बुआ, आप ही पटाईं होंगी न?”
बुआ हँसी, “अरे, पटाना नहीं कहो… आत्मीयता कहो। हम दोनों को ही किताबें पसंद थीं। वो ‘निराला’ पढ़ता, मैं ‘महादेवी’। कभी आम के पेड़ के नीचे बैठते, कभी पोखर के किनारे। एक दिन उसने कहा था—‘कांता, अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारे लिए एक कविता लिखूँ।’”
पिंकी ने तुरंत मोबाइल निकाला, “बुआ! ये तो बहुत ही cinematic love story है!”
गुड्डू बोला, “बस अब BTS और Trailer मत बना देना!”
बुआ ने गहरी साँस ली, “फिर क्या… उसने चिट्ठी लिखी। बहुत सुंदर। उसमें लिखा था—‘कन्याकुंभ में मिलेंगे, जब उम्रें बीत जाएँ, पर वादा न टूटे।’ मैंने हँसकर कहा था—‘हाँ, तब तक तो मैं लाठी टेक रही होऊँगी।’”
लल्ला धीमे से बोला, “और वो दिन आज आ गया, बुआ?”
बुआ की आँखें नम थीं, “हाँ बेटा। कन्याकुंभ में मैं आई। मैं नहीं जानती कि रघुवीर अब है भी या नहीं… लेकिन मैंने जो वादा किया था, उसे निभाने आई।”
रामप्यारी पोंछते हुए बोली, “बुआ… आप तो बहुत ही फिल्मी निकलीं!”
बुआ ने पंखा झलते हुए कहा, “ये तो जिंदगी है बिटिया। औरत की कहानी सिर्फ चूल्हा-चौका तक नहीं होती… उसमें भी कभी-कभी कविता छुपी होती है।”
गुड्डू ने सिर खुजाया, “लेकिन बुआ, आप तो कहती थीं कि ‘पुरुषों पर भरोसा करना मूर्खता है, और बर्फी पर भरोसा वजन बढ़ाता है’ – अब ये सब उल्टा कैसे?”
बुआ बोली, “बात भरोसे की नहीं है गुड्डू। बात उस एहसास की है जो कभी पूरा नहीं हुआ… अधूरी चीज़ों की भी अपनी खूबसूरती होती है।”
पिंकी ने कैमरा ऑन कर दिया, “बुआ, ये कहानी तो सभी को जाननी चाहिए। मैं इसे ‘बुआ के राज़’ नाम से पोस्ट करूँगी!”
बुआ मुस्कुरा दीं, “पर ध्यान रहे, वीडियो के बैकग्राउंड में कोई भजन चलाना, ये कोई बॉलिवुड मूवी नहीं है।”
तभी अनाउंसमेंट हुआ—
“सभी प्रतिभागियों को मंच पर प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया जाता है! बिल्लूपुर महिला मंडल, कृपया मंच पर पधारें।”
गुड्डू घबरा गया, “अब तो मंच भी बाकी है! आप सबके इस लव स्टोरी ड्रामे में, मैंने वो स्क्रिप्ट कहाँ रखी?”
रामप्यारी चिल्लाई, “मंच पर जाने से पहले चाय और सूखा मठरी खा लें – वरना बुआ बीच में भूख से क्रांति करने लगेंगी।”
बुआ ने उठते हुए कहा, “अब मंच हमारा है। और हमारी प्रस्तुति कोई साधारण नाटक नहीं होगी, ये होगा—‘एक अधूरी चिट्ठी का जवाब’।”
पिंकी ने मोबाइल जेब में रखा और मुस्कुरा कर कहा, “बुआ, इस कहानी का हैशटैग मैं तय कर चुकी हूँ—
#KanyaKumbhLoveLetter #TrainQueenReturns”
बुआ ने मंच की ओर कदम बढ़ाते हुए कहा, “आज हम बताएँगे – कि नारी सिर्फ त्याग की मूरत नहीं, यादों की मशाल भी है।”
भाग 7: रघुवीर और बुआ का रीयूनियन
बिल्लूपुर महिला मंडल का पूरा दल अब मंच के पास था। भीड़ उमड़ी पड़ी थी — कोई दुपट्टा सम्हाल रही थी, कोई सेल्फी ले रहा था, तो कोई जलेबी खा रहा था। लेकिन कांता बुआ के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। आज वो सिर्फ नाटक करने नहीं, एक अधूरी चिट्ठी का जवाब देने मंच पर जा रही थीं।
पिंकी ने कैमरा ऑन किया, “लाइव देखिए – TrainQueen कांता बुआ की स्पेशल प्रस्तुति: ‘एक अधूरी चिट्ठी का जवाब’।”
गुड्डू स्टेज के एक कोने में स्क्रिप्ट लेकर हाँफते हुए बोला, “बुआ, मैंने डायलॉग याद करवा दिए हैं। कहीं भूल मत जाना!”
बुआ ने सिर ऊँचा करके कहा, “हम भावनाओं से काम करते हैं, स्क्रिप्ट से नहीं।”
भीड़ में अब उत्सुकता फैल चुकी थी। मंच संचालक ने माइक थामा:
“अब प्रस्तुत है बिल्लूपुर महिला मंडल की प्रस्तुति, जिसमें दिखेगा—प्यार, प्रतिरोध, और पुरानी चिट्ठियों का चमत्कार!”
बुआ मंच के बीचोंबीच पहुंचीं। सामने बैठी भीड़ में कई युवा लड़कियाँ, बुज़ुर्ग महिलाएँ और पुरुष दर्शक थे। पहली लाइन में बैठा एक वृद्ध व्यक्ति अपने छड़ी के सहारे सीधा बैठा हुआ था। उसकी आँखें बुआ पर टिक गईं।
बुआ ने मंच पर बोलना शुरू किया,
“एक लड़की थी… कांता। और एक लड़का था… रघुवीर। उन्होंने एक वादा किया था—कि एक दिन, किसी मेले में, किसी भीड़ में, किसी मंच पर… मिलेंगे। लेकिन कभी मिले नहीं। पर क्या हर मिलन ज़रूरी होता है?”
तभी… भीड़ से एक आवाज़ गूँजी—
“कांता!”
मंच पर जैसे बिजली दौड़ गई। बुआ का मुँह खुला का खुला रह गया। पिंकी कैमरा झुका नहीं पाई।
सामने से वही वृद्ध व्यक्ति उठा, छड़ी फेंकी और सीधे मंच की ओर बढ़ा। भीड़ दो हिस्सों में बँट गई।
“रघुवीर?” बुआ की आवाज़ काँप रही थी।
वृद्ध व्यक्ति थोड़ा करीब आया, और धीमे से बोला,
“हमने भी वही चिट्ठी संभाल रखी थी कांता… तुमने कहा था कि कन्याकुंभ में मिलेंगे। हम आते रहे, हर बार। पर तुम नहीं आईं।”
बुआ की आँखों में आँसू छलक आए, “हमने भी चिट्ठी रखी थी… झोले में। पर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाए आने की… अब आए तो लगा शायद तुम…”
रघुवीर ने पास आकर कहा,
“आज तुमने मंच पर वो सब कह दिया… जो मैं पचास सालों से चुपचाप सोच रहा था।”
भीड़ ताली बजाने ही वाली थी, लेकिन मंच संचालक कन्फ्यूज़ था,
“माफ कीजिए… ये स्क्रिप्ट में नहीं था!”
गुड्डू ने माइक छीनते हुए कहा, “ये स्क्रिप्ट वाला मामला नहीं है। ये दिल से निकला हुआ ‘live improv’ है।”
पिंकी ने जोर से कहा,
“यहां बिल्लूपुर की ‘TrainQueen’ को उसका ‘Platform King’ मिल गया है! हैशटैग बन गया—#ReunionAtKumbh!”
चम्पा पीछे से बोली, “अब क्या बुआ और रघुवीर मिलके duet गाएँगे?”
बुआ ने रघुवीर का हाथ थामा और मंच की ओर मुड़कर बोली,
“हम नहीं जानते कि आगे क्या होगा। लेकिन हमने उस अधूरी चिट्ठी को मंच पर पढ़ा, और जवाब भी दे दिया।”
गुड्डू भुनभुनाया, “अब मैं कन्याकुंभ की जगह इस यात्रा को ‘कन्याकुंठित यात्रा’ कहूँ क्या?”
रघुवीर ने हँसते हुए बुआ से पूछा,
“अब क्या, कांता? साथ जलेबी खाएँ?”
बुआ बोलीं, “जलेबी के साथ नमकीन भी, ताकि मीठा न चढ़ जाए!”
तभी लल्ला दौड़ता हुआ आया—“बुआ! आप viral हो गईं! इंस्टा पर 50,000 व्यूज़! और कमेंट्स में लोग पूछ रहे हैं—‘क्या ये असली है या स्क्रिप्टेड?’”
पिंकी ने हँसकर कहा,
“दिल की बात स्क्रिप्ट से नहीं लिखी जाती… वो तो सिर्फ मंच से उतरती है, आँसुओं के साथ।”
गु़ड्डू मंच के एक कोने में बैठा रहा। “अब अगली बार बुआ बोलेंगी – ‘हमें हनीमून पर ऋषिकेश ले चलो!’”
बुआ मंच से नीचे उतरते हुए बोलीं,
“रघुवीर, चलो… आज साथ घूमते हैं। मेला भी देख लेते हैं और जवानी की गलियाँ भी।”
रघुवीर हँसते हुए बोला, “और अगर भटक गए तो?”
बुआ ने आँख मारी, “अब तो GPS है… और पिंकी भी!”
भाग 8: बिल्लूपुर बनाम कन्याकुंभ
बुआ और रघुवीर के मंचीय रीयूनियन के बाद, कन्याकुंभ में जैसे हलचल मच गई। लोग कह रहे थे, “बिल्लूपुर मंडल तो सिर्फ घूमने नहीं, इमोशनल आंधी बनकर आया है!”
लेकिन बुआ यहीं रुकने वालों में नहीं थीं। अगली सुबह, उन्होंने पूरे मंडल को चौपाल की तरह गोल बिठा लिया और बोलीं,
“अब समय है असली लड़ाई का। आज है प्रतियोगिता दिवस – जहाँ तय होगा कि कौन बनेगा ‘कन्याकुंभ की रानी’।”
रामप्यारी ने चाय का कप हाथ में लेते हुए पूछा, “बुआ, प्रतियोगिता में होगा क्या?”
बुआ ने चश्मा ठीक करते हुए चार उँगलियाँ गिनाईं—
“रस्साकशी, लूडो, भजनगायन और ‘सबसे तेज़ मुँह चलाने वाली महिला’। हम सबमें भाग लेंगे। और याद रखना – जीत सिर्फ कप में नहीं, ठप्पे में होती है।”
गुड्डू झोले में सिर डालकर बड़बड़ा रहा था, “बुआ अब कन्याकुंभ को ओलंपिक बना देंगी। कहीं भाला फेंक प्रतियोगिता भी हो जाए तो मैं ही उड़ जाऊँगा।”
लल्ला यादव जोश में आ गया, “बुआ, मैं रस्साकशी में आपके साथ रहूँगा! मैंने तो कंधे पर बोरी उठाई है, रस्सी क्या चीज़ है!”
बुआ बोलीं, “लल्ला, तुम्हारी ताकत पर भरोसा है। पर ये मुकाबला सिर्फ बाहुबल का नहीं, बुद्धिबल का भी है!”
और फिर मंडल पहुंचा प्रतियोगिता स्थल पर। वहाँ पहले से ही अन्य गाँवों की महिला मंडल लाइन में लगी थीं—सज-संवरकर, एक से एक झोले, और आँखों में प्रतिस्पर्धा की चमक।
स्टेज से उद्घोषणा हुई—
“पहली प्रतियोगिता: रस्साकशी! टीम बिल्लूपुर बनाम टीम बटेसर!”
बुआ ने अपने दुपट्टे को कमर में बांधा, रामप्यारी ने चप्पल उतारी, गोमती ने बिंदी को सीधा किया और चम्पा ने मंजन छोड़ सीधे रस्सी पकड़ी।
“खींचो बिल्लूपुरियो! खींचो!” – पिंकी ने मोबाइल कैमरा एक हाथ में और ताली दूसरे हाथ से बजाई।
शुरुआत हुई। पहले तो बटेसर मंडल भारी पड़ा… फिर बुआ गरजीं—
“याद करो, जब बिजली बिल ज्यादा आया था, तब कैसे खींची थी छूट!”
एक झटके में बिल्लूपुर की टीम रस्सी खींचती गई और आखिरी “झटास” के साथ बटेसर मंडल गिरी गई पीछे की तरफ।
तालियाँ गूंज उठीं!
“दूसरी प्रतियोगिता – लूडो!”
बुआ को राजा बनने का मौका मिला। लेकिन सामने थी बरैली की ‘लीला दीदी’, जिनके बारे में कहा जाता था कि वो ज़िंदगी को भी लूडो समझकर चलती हैं।
बुआ ने चाल चली। लीला दीदी ने काटी। बुआ ने फिर घर के पास गोटी लाकर खड़ी की… फिर लीला दीदी की “छक्का-छक्का” की गूंज।
आखिर बुआ बोलीं, “ये छक्का नहीं, कोई बटनों वाला पासा है क्या? बिटिया, देखना तो कहीं remote से तो नहीं चला रही?”
गुड्डू बोला, “बुआ, हार मानो… ये लूडो नहीं, ब्लूटूथ लूडो है!”
बुआ बोलीं, “ठीक है, एक गेम से बिल्लूपुर की इज्ज़त नहीं जाती। अभी दो और बाकी हैं।”
“तीसरी प्रतियोगिता – भजन गायन!”
गोमती ने हारमोनियम उठाया, रामप्यारी ने मंजीरा। पिंकी बोली, “बैकग्राउंड ट्रैक है Ready – Remixed जय अंबे गौरी।”
बुआ बोलीं, “भजन में भी नई हवा चाहिए। आज अंबे माता भी DJ से डरती नहीं!”
गाना शुरू हुआ—
“जय अंबे गौरी… Beat drops…
प्यारी हमारी माई… घुंघरू पहने आई…”
भीड़ हँसते-हँसते लोटपोट।
“बिल्लूपुर महिला मंडल – ताली के साथ पास!”
फाइनल राउंड – सबसे तेज़ मुँह चलाने वाली महिला प्रतियोगिता।
होस्ट ने पूछा, “आपको एक विषय मिलेगा। बिना रुके एक मिनट बोलिए।”
बुआ मंच पर पहुँचीं, दुपट्टा झटककर बोलीं, “विषय दो। हम ठहरे गांव की महिला, हर विषय पर राय रखते हैं।”
विषय मिला – ‘नारी को घर में रहना चाहिए या बाहर?’
बुआ शुरू हुईं, और फिर रुकी ही नहीं—
“घर में रही तो चूल्हा संभाला, बाहर निकली तो चांद तक पहुँची। कभी घर में रोई, कभी संसद में बोली। ये बहस बेकार है, क्योंकि नारी वहाँ होती है जहाँ जरूरत हो। और ये सब हम कह रही हैं—कांता देवी उर्फ TrainQueen, बिल्लूपुर मंडल से!”
सारी भीड़ खड़ी हो गई। तालियाँ, सीटी, हूटिंग! मंच डोल गया।
गुड्डू आँखें पोंछते हुए बोला, “अब मैं गर्व से कह सकता हूँ—मैं बुआ का भतीजा हूँ!”
पिंकी ने मोबाइल कैमरे में फिनिशिंग लाइन बोली,
“TrainQueen ने फिर से जीत लिया कन्याकुंभ! #NariPower #BuaForPresident”
बुआ मंच से उतरीं, और रघुवीर ने पास आकर पूछा, “अब और क्या बचा है कांता?”
बुआ ने मुस्कुराकर कहा, “अब बचा है… पुरस्कार! और उसके बाद, सेल्फी!”
भाग 9: पुरस्कार और बवाल
कन्याकुंभ का अंतिम दिन था। पूरा मैदान झिलमिल झूलों, चूड़ी वालों की चिल्ल-पों, और मंच की अंतिम घोषणाओं से गूँज रहा था। लेकिन सबसे ज़्यादा चहल-पहल उस छोटे से मंच के पास थी जहाँ ‘कन्याकुंभ रानी सम्मान’ घोषित होने वाला था।
बुआ ने अपने बालों में गुलाब का फूल लगाया, चम्पा ने उन्हें हल्का गुलाबी पाउडर लगाया, और रामप्यारी ने कहा, “बुआ, आज तो आपको ही ताज मिलेगा!”
गुड्डू ने पीछे से फुसफुसाया, “अगर पुरस्कार ना मिला तो बुआ यही मंच पटकेंगी।”
स्टेज पर मेले के संयोजक माइक संभाल रहे थे—
“हम कन्याकुंभ की आयोजक समिति की ओर से इस वर्ष की ‘कन्याकुंभ रानी’ घोषित कर रहे हैं—बिल्लूपुर की कांता देवी!”
सारा मैदान तालियों से गूँज उठा। पिंकी की इंस्टा लाइव स्क्रीन पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई—
“TrainQueen becomes KumbhQueen!”
“बुआ फॉर पंचायती मंत्री!”
“कांता बुआ, हम आपके फैन हैं!”
बुआ मंच पर पहुँचीं, ताज पहनाया गया, एक माला डाली गई जो उनके कंधे तक ही पहुँची, और एक मोमेंटो पकड़ा गया जिस पर लिखा था —
“प्रतिरोध की प्रतीक, बिल्लूपुर की बुआ।”
बुआ ने माइक थामा,
“ये सम्मान सिर्फ हमारे लिए नहीं, उन सबके लिए है जो कभी चुप थीं, अब बोलने लगी हैं। जो कभी झोला उठाकर चलती थीं, अब मंच पर झंडा लहरा रही हैं!”
भीड़ में लहर दौड़ गई।
लेकिन… जैसे ही मंच से बुआ उतरीं, पीछे से एक कर्कश आवाज़ गूंजी—
“ये सब झूठ है! ये पुरस्कार खस्ता कचौड़ी के बदले दिया गया है!”
सब चौंक गए।
पीछे खड़ी थीं बरैली महिला मंडल की नेता – लीला दीदी! वही, जिनकी लूडो प्रतियोगिता बुआ ने ‘ब्लूटूथ छक्का’ कहकर उड़ा दी थी।
“हमने अपनी आँखों से देखा!” लीला दीदी चिल्लाईं। “कल शाम कांता देवी ने निर्णायकों को खस्ता खिलाया था! और वही निर्णायक आज इन्हें ताज पहना रहे हैं!”
गुड्डू ने माथा पकड़ा, “लो! अब बुआ की कचौड़ी भी भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गई।”
बुआ पीछे मुड़ीं और मंच पर वापसी कर गईं।
“लीला दीदी,” बुआ ने गरजते हुए कहा, “हम खस्ता बाँटते हैं, रिश्वत नहीं। और अगर हमारी कचौड़ी इतनी असरदार है कि उससे निर्णायक पिघल जाएँ, तो आप भी दो खा लें – शायद आपका मन बदल जाए!”
भीड़ ठहाकों में डूब गई।
पिंकी ने तुरंत स्टोरी डाली:
“Bua vs Bareilly Begins!
#KachoriPolitics #TrainQueenClapsBack”
लीला दीदी फिर चिल्लाईं, “ये नहीं चलेगा! हम इस पुरस्कार के खिलाफ आधिकारिक शिकायत दर्ज करेंगे!”
बुआ शांत भाव से बोलीं,
“शिकायत दर्ज करना आपका अधिकार है, दीदी। लेकिन याद रहे – हमारे पास गवाह भी हैं, कैमरा भी, और अचार का वो डिब्बा भी जिसमें हमने संयोजक जी के लिए संदेश लिखा था – ‘जैसे स्वाद वैसी श्रद्धा’।”
तभी संयोजक मंच पर आए, “हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि कांता देवी को दिया गया पुरस्कार पूरी तरह पारदर्शी है। खस्ता हमने खाई ज़रूर थी, पर वो सिर्फ स्वाद के लिए, भावनाओं के लिए – न कि फैसले के लिए।”
बुआ मुस्कुरा कर बोलीं,
“कभी-कभी स्वाद भी राजनीति से बड़ा होता है, दीदी।”
चम्पा पीछे से बोली, “बुआ, आप तो राजनीति में आ जाइए। टिकट फ्री में मिल जाएगा।”
गुड्डू ने कहा, “हाँ, टिकट तो मिल जाएगा… पर मंच संभालना आपको ही पड़ेगा!”
रघुवीर पास आकर बोले, “अब चलो कांता… पुरस्कार भी मिल गया, बहस भी जीत ली, अब मेले में गोलगप्पे खाते हैं।”
बुआ ने सिर ऊँचा किया, “आज नहीं रघुवीर… आज तो सेल्फी खिंचवानी है ‘ताज’ के साथ। जीवन में पहली बार रानी बनी हूँ—फेसबुक पर DP तो बनती है!”
भीड़ के बीच बुआ की एक सेल्फी वायरल हो गई—
“ताज वाली बुआ, आँखों में विद्रोह, हाथ में खस्ता, और पीछे खड़ा रघुवीर!”
भाग 10: घर वापसी और टिक-टॉक बम
कन्याकुंभ की गहमागहमी अब शांत हो रही थी। स्टॉल बंद हो चुके थे, झूले अब धीमे पड़ चुके थे, और मंच से लाउडस्पीकर पर बज रहा था—
“हम फिर मिलेंगे अगले वर्ष… नारी शक्ति के संग!”
बुआ ताज सम्हाले, मोमेंटो झोले में डाले, गर्वित मुस्कान के साथ बिल्लूपुर महिला मंडल को लेकर वापसी की ट्रेन पकड़ चुकी थीं। ट्रेन के डिब्बे में माहौल वही था—खस्ता कचौड़ी की खुशबू, रामप्यारी की चूड़ियों की खनक, और चम्पा की बेसुरी गुनगुनाहट।
गुड्डू एक कोने में बैठे बोले जा रहा था,
“ये सिर्फ एक मेला नहीं था… ये तो मिशन मार्स जैसा अनुभव था। हमने मंच भी सम्हाला, बवाल भी किया और बुआ को ‘कन्याकुंभ रानी’ भी बना डाला!”
बुआ खिड़की के पास बैठी थीं। बालों में अब भी वही गुलाब का फूल, और हाथ में मोबाइल। पिंकी उन्हें TikTok का नया फीचर सिखा रही थी।
“बुआ, देखिए, यहाँ से बैकग्राउंड म्यूजिक जोड़ सकते हैं… यहाँ से ट्रांज़िशन… और ये वाला फिल्टर लगाएँगी तो आप बीस साल छोटी लगेंगी!”
बुआ बोलीं, “अरे बिटिया, बीस साल छोटी दिखी तो रघुवीर मुझे पहचानने से मना कर देगा!”
लल्ला यादव बोला, “बुआ, आप जैसा कोई नहीं! आपका वीडियो तो अब तक 1 लाख व्यूज़ पार कर चुका है। इंस्टा पर आपको लोग ‘क्रांति काकी’ कहने लगे हैं!”
बुआ ने ठंडी मुस्कान से कहा, “काकी ही सही… लेकिन कंबल ओढ़ने से पहले क्रांति की आग जला देना चाहिए।”
ट्रेन स्टेशन पर पहुँची। बिल्लूपुर प्लेटफॉर्म पर पहले से भीड़ जमा थी—ढोलक, माला, पोस्टर, और मिठाई के डिब्बे। सामने बोर्ड लगा था—
“बिल्लूपुर की शान – कांता बुआ महान!”
रामप्यारी बोली, “अरे ये तो चुनाव जीतने जैसा स्वागत है!”
चम्पा बोली, “बस गाड़ी में फूलों की बारिश रह गई!”
बुआ ट्रेन से उतरीं तो जैसे किसी रथ से उतरी रानी। बच्चों ने माला पहनाई, बुज़ुर्गों ने आशीर्वाद दिया, और मुन्नी काकी ने तो पूछ लिया, “बुआ, अब अगली क्रांति किस दिशा में होगी?”
बुआ बोलीं, “पहले अचार की बोतलें जम जाएँ, फिर क्रांति पर विचार होगा।”
गुड्डू घर पहुँचते ही सोफे पर गिर पड़ा, “हे ट्रेन की देवी, अब कभी मत बुलाना!”
पिंकी दौड़कर बोली, “बुआ, TikTok वीडियो अपलोड करना बाकी है! आज का आखिरी धमाका!”
बुआ ने ताज सिर पर रखा, पल्लू ठीक किया, और कैमरे की ओर मुस्कुराकर बोलीं—
“नमस्ते बिटिया लोगों!
हम लौट आए हैं कन्याकुंभ से – जहाँ हमने जीती प्रतियोगिता, दिल, और थोड़ी बहुत बहसें भी।
लेकिन असली जीत?
वो है – झोले में रखा रघुवीर का साथ, और तुम्हारे प्यार का स्वाद!”
बैकग्राउंड म्यूजिक: “पल पल दिल के पास…”
वीडियो वायरल हो गया।
एक घंटे में 2 लाख व्यूज़।
कमेंट्स की बाढ़—
“बुआ for CM!”
“TrainQueen to TikTokQueen!”
“Where can we buy the ‘बुआ की खस्ता’?!”
गुड्डू ने थककर कहा, “अब बस करो बुआ… अब घर बैठकर रामायण देखो।”
बुआ बोलीं, “रामायण तो कन्याकुंभ में हो गई बेटा – सीता भी बनी, रावण भी, और लक्ष्मण रेखा हमने खुद मिटाई।”
रघुवीर ने बाहर से आवाज़ दी, “कांता, चाय पियो, फिर फॉलोअर्स का जवाब देना।”
बुआ बोलीं, “हाँ, पहले जवाब देंगे… फिर अगली योजना बनाएंगे। अगला पड़ाव—‘बृजवाणी भजन महोत्सव’!”
सबकी आँखें फटी रह गईं।
गुड्डू बोला, “हे भगवान! अब बृजवाणी?!”
बुआ ने मुस्कुराकर कहा,
“अरे बेटा, उम्र बढ़ रही है, लेकिन हमारा नेटवर्क भी… और नज़रिया भी। औरतें अब सिर्फ ताज नहीं पहनेंगी, समय भी बदलेंगी!”
बिल्लूपुर के आसमान में शंख नहीं, हँसी की गूंज थी। कांता बुआ, जो कभी बस एक झोले और लाठी के साथ सफर करती थीं, अब नारी शक्ति की मिसाल बन चुकी थीं—TikTok, मेले, और अपने सतरंगी अंदाज़ के साथ।
~ समाप्त ~




