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आख़िरी ट्रेन टू बनारस

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सौरभ पांडेय


भाग 1 – बनारस की रात

बनारस स्टेशन की पुरानी घड़ी रात के ग्यारह बजकर पैंतीस मिनट दिखा रही थी और प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ियों की आवाजाही थम-सी गई थी, आख़िरी ट्रेन के इंतज़ार में कुछ बचे-खुचे यात्री धीरे-धीरे अपनी चादरें समेट रहे थे, कोई थैले से समोसा निकालकर खा रहा था, तो कोई चाय वाले की स्टील के गिलास से धुआँ उड़ाते हुए अपने थके चेहरे को राहत दे रहा था, और इसी भीड़ में कबीर हाथ में पुराना बैग थामे बेचैन नज़रों से ट्रैक की ओर देख रहा था क्योंकि उसे किसी भी हालत में ये आख़िरी ट्रेन पकड़नी थी, जो उसे दिल्ली पहुँचा देती, मगर उससे ज़्यादा अहम था उस सफ़र में एक अनजाना इंतज़ार, जो खुद भी समझ नहीं पा रहा था कि किस चीज़ का है, सिर्फ़ इतना जानता था कि अगर ये ट्रेन छूट गई तो जैसे कोई दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। वहीँ दूसरी ओर पलक अपनी सीट रिज़र्वेशन स्लिप को बार-बार मोड़ते हुए देख रही थी, उसे स्टेशन की भीड़ से ज़्यादा उस अनकही खामोशी का डर था जो उसके भीतर उठ रही थी, दरअसल वह बनारस आई तो थी अपने कॉलेज की मीटिंग के बहाने मगर लौटते वक्त ऐसा लग रहा था जैसे इस शहर ने उसकी रूह में कुछ छोड़ दिया है, कुछ ऐसा जो वह शब्दों में नहीं कह सकती, और इसलिए जब उसने आख़िरी ट्रेन का टिकट लिया तो खुद को समझाया कि सफ़र खत्म करके जैसे ही दिल्ली लौटेगी, सब सामान्य हो जाएगा, मगर दिल मान नहीं रहा था। प्लेटफ़ॉर्म की पीली रोशनी में जब उसकी और कबीर की नज़रें अचानक टकराईं तो दोनों को लगा कि शायद वे पहले भी कहीं मिले हैं, शायद किसी भीड़ भरे मेले में, या किसी कक्षा में, या किसी गली में, मगर ये पहचान धुँधली और अजीब थी, जैसे कोई धुन कानों में बजे और याद न आए कि ये सुनी कहाँ है। कबीर ने पहले नज़रें हटा लीं, मगर पलक के चेहरे पर फैली अनिश्चितता उसे फिर खींच लाई, और अचानक वह सोचने लगा कि काश उसे हिम्मत होती और वह कह पाता—क्या हम पहले कहीं मिले हैं? ट्रेन की सीटी बजी और यात्रियों में हलचल होने लगी, लोग अपने डिब्बों की ओर दौड़े, कुली सामान खींचते हुए चिल्लाए, और इसी अफ़रातफ़री में कबीर और पलक लगभग एक ही दरवाज़े की ओर बढ़े, दोनों का सामान टकराया और दोनों झेंपकर मुस्कुराए, कोई औपचारिकता नहीं हुई, बस आँखों में एक अजीब-सा भरोसा उतर आया, जैसे इस सफ़र में वे अजनबी नहीं रहेंगे। डिब्बे के भीतर भीड़ थी, लेकिन दोनों को पास-पास सीट मिल गई, शायद किस्मत की लिखावट थी, और जब ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी तो खिड़की के बाहर बनारस की गलियों की लाइटें पीछे छूटने लगीं, मंदिर की घंटियाँ दूर बज रही थीं, और गंगा के ऊपर से आती ठंडी हवा डिब्बे की खिड़कियों से अंदर घुस रही थी। कबीर ने चुप्पी तोड़ने की कोशिश में पूछा—आप दिल्ली जा रही हैं? पलक ने सिर हिलाकर कहा—हाँ, और आप? कबीर ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया—मैं भी। फिर थोड़ी देर दोनों चुप हो गए, जैसे हर शब्द को तौल रहे हों कि बोलना चाहिए या नहीं। ट्रेन ने स्पीड पकड़ ली और रात गहराने लगी, बाहर अंधेरे में खेत और छोटे-छोटे गाँव सरकते जा रहे थे, डिब्बे के भीतर हल्की पीली रोशनी और यात्रियों की थकी साँसें एक अजीब-सी लय बना रही थीं। पलक ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—बनारस छोड़ना हमेशा मुश्किल होता है, न जाने क्यों। कबीर ने उसकी ओर देखते हुए धीरे से कहा—क्योंकि कुछ शहर आपको अपने हिस्से में बाँध लेते हैं। उनकी नज़रें फिर मिलीं और इस बार कोई झेंप नहीं थी, बस एक अनकही पहचान, और शायद उसी पल दोनों को एहसास हुआ कि ये सफ़र सिर्फ़ मंज़िल तक पहुँचने का नहीं होगा, बल्कि किसी अनजानी शुरुआत का भी होगा।

 

भाग 2 – सफ़र की पहली रात

ट्रेन अब पूरी रफ़्तार पकड़ चुकी थी और डिब्बे की खिड़की से बाहर देखती पलक को ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरे में दौड़ते पेड़, गाँव और खेत उसके साथ कोई पुराना खेल खेल रहे हों, कभी पास आते और तुरंत ओझल हो जाते, बिलकुल वैसे ही जैसे उसके जीवन में लोग आते-जाते रहे हैं बिना कोई ठिकाना दिए, और कबीर, जो सामने की सीट पर बैठा था, उसे देख रहा था, सोच रहा था कि क्या हर चेहरे पर छिपी कहानी को समझा जा सकता है, क्या हर नज़र का बोझ पढ़ा जा सकता है, और तभी उसकी नज़र पलक के हाथ पर पड़ी जहाँ वह टिकट को बार-बार मोड़ रही थी, जैसे बेचैनी काग़ज़ पर उतार देना चाहती हो। कबीर ने हल्के स्वर में कहा—क्या पहली बार बनारस आई थीं? पलक ने धीमे से सिर हिलाया और बोली—हाँ, और शायद आख़िरी बार भी, क्योंकि कुछ जगहें ज़िंदगी भर के लिए याद बन जाती हैं, दोबारा लौटने की हिम्मत ही नहीं होती। कबीर ने उसकी ओर देख कर कहा—कभी-कभी इंसान लौटता नहीं, लेकिन शहर उसके भीतर लौट आते हैं, और फिर वहीं बस जाते हैं। पलक ने उसकी आँखों में देखा, कुछ कहना चाहा मगर चुप रह गई, जैसे शब्द उसके होंठों तक आकर जम गए हों। डिब्बे में बाकी यात्री धीरे-धीरे नींद में डूब रहे थे, कोई अख़बार बिछाकर सीट पर लुढ़क गया, कोई बच्चे को गोद में लिए उनींदा बैठा था, मगर इस हलचल के बीच कबीर और पलक की खामोशी गहरी होती जा रही थी, जैसे किसी अदृश्य धागे ने उन्हें बाँध दिया हो। कबीर ने अचानक पूछा—आपको डर नहीं लगता अकेले सफ़र करने से? पलक ने मुस्कराते हुए कहा—डर तो हर किसी को लगता है, लेकिन सफ़र का मज़ा तभी है जब उसमें अनजाना सा रोमांच हो, और फिर जोड़कर बोली—शायद डर ही हमें ज़िंदा रखता है। कबीर ने पहली बार खुलकर हँसते हुए कहा—और कभी-कभी डर ही हमें किसी अनजान के करीब ले आता है। दोनों की हँसी ठंडी हवा में घुल गई और डिब्बे के भीतर गूंज उठी, कुछ यात्रियों ने सिर उठाकर देखा भी मगर फिर अपनी नींद में लौट गए। बाहर अंधेरे में गंगा का किनारा बहुत पीछे छूट चुका था और अब ट्रेन मैदानी इलाकों से गुजर रही थी, खिड़की से आती हवा में धान की हल्की खुशबू थी। पलक ने अचानक पूछा—क्या आप लिखते हैं? कबीर चौंका—क्यों? पलक बोली—आपकी बातें सुनकर लगता है जैसे हर शब्द में कोई गहराई है, जैसे साधारण वाक्य भी कविता बन जाता है। कबीर ने थोड़ी झिझक के बाद कहा—हाँ, कभी-कभी लिखता हूँ, पर ज़्यादातर फाड़ देता हूँ, क्योंकि लिखना तो आसान है, मगर अपने ही लिखे हुए से सामना करना मुश्किल होता है। पलक ने उसकी ओर गहरी नज़र से देखा और कहा—कभी-कभी अपने ही लिखे शब्द हमें रास्ता दिखाते हैं। दोनों चुप हो गए, मगर इस चुप्पी में एक नई नज़दीकी उतर आई थी, जैसे दो अजनबी अपने भीतर के डर और सपनों को धीरे-धीरे साझा करने लगे हों। ट्रेन रात के ढाई बजते-बजते एक छोटे स्टेशन पर रुकी, बाहर चाय और समोसे की आवाज़ें गूँजीं, कुछ यात्री उतरे और कुछ चढ़े, और उसी अफ़रातफ़री में कबीर खिड़की से बाहर झुककर बोला—चाय? पलक ने सिर हिलाया और कबीर दो मिट्टी के कुल्हड़ लेकर लौटा, गरम चाय की भाप और मिट्टी की खुशबू ने जैसे दोनों के बीच की अनकही बातों को और गाढ़ा कर दिया। पलक ने चाय का घूँट लेते हुए कहा—शहर चाहे कोई भी हो, मगर कुल्हड़ की चाय हर जगह अपना जादू छोड़ देती है। कबीर ने उसकी ओर देख कर कहा—क्योंकि इसमें घर जैसी गर्माहट होती है। और सचमुच, उस छोटे से कुल्हड़ में जैसे एक रिश्ते की शुरुआत पिघल रही थी, धीरे-धीरे, बिना किसी औपचारिक घोषणा के। ट्रेन फिर से चल पड़ी और इस बार दोनों ने बाहर नहीं देखा, बल्कि एक-दूसरे की आँखों में झाँकते रहे, मानो इस सफ़र की असली मंज़िल वही है जो उनके बीच बन रही है।

 

भाग 3 – अधूरी बातें

ट्रेन अब आधी रात की चुप्पी चीरते हुए तेज़ी से दौड़ रही थी और डिब्बे के भीतर की रोशनी फीकी पड़ती जा रही थी, जैसे नींद की परत सब पर उतर रही हो, मगर पलक और कबीर के बीच नींद कहीं भटक गई थी, दोनों की आँखों में जागती हुई बेचैनी थी और शायद कुछ अनकहे सवाल भी, पलक खिड़की के पास सर टिकाकर बाहर अंधेरे को देख रही थी मानो उस अंधेरे में कोई जवाब लिखा हो और कबीर चुपचाप उसकी उंगलियों की हरकतों पर ध्यान दे रहा था जो टिकट को बार-बार मोड़ते-खोलते हुए अनजानी लय बना रही थीं, अचानक पलक ने पूछा—आपको कभी किसी शहर से इतना मोह हुआ है कि छोड़ते वक्त दिल टूट जाए? कबीर ने थोड़ा सोचकर कहा—हाँ, शायद बनारस से, क्योंकि वहाँ समय रुक जाता है, और जब आप लौटते हैं तो लगता है कि आप ही पीछे रह गए हैं, शहर आगे बढ़ गया है। पलक ने धीमे स्वर में कहा—मुझे भी यही लगा, जैसे गंगा किनारे बैठे हुए हर लहर मुझे बुला रही थी कि मत जाओ, मगर फिर ज़िंदगी है, नौकरी है, ज़िम्मेदारियाँ हैं, और हम सब भागते रहते हैं। कबीर ने उसकी ओर देखा और कहा—शहर हमें छोड़ देता है, पर कभी-कभी लोग भी, और उनका खालीपन किसी भी गली से बड़ा होता है। पलक कुछ पल चुप रही फिर बोली—कभी-कभी छोड़ना ज़रूरी भी होता है, क्योंकि पकड़ कर रखना और दर्द देता है। उनकी बातचीत में अब खुलापन था, जैसे वे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों, और इसी बीच ट्रेन ने एक पुल पार किया, नीचे काली नदी बह रही थी जिसकी लहरों पर चाँदनी हल्की चमक रही थी, दोनों खिड़की से झुककर देखने लगे और उसी क्षण उनके हाथ अनजाने में छू गए, पलक ने झेंपकर हाथ खींच लिया मगर कबीर ने हल्की हँसी में कहा—डरिए मत, पुल ही तो है, गिरेंगे नहीं। पलक ने भी मुस्कुरा दिया और बोली—कुछ पुल डराते भी हैं, और कुछ जोड़ देते हैं। दोनों की हँसी देर तक गूँजती रही। डिब्बे के अंदर अब ज़्यादातर लोग खर्राटे ले रहे थे, कोई बच्चा माँ की गोद में सिमटा था, कोई बुज़ुर्ग चादर में लिपटा हुआ सीट पर लेटा था, इस शोरगुल के बीच उनकी बातचीत एक अलग ही दुनिया बना रही थी। पलक ने अचानक गंभीर होकर पूछा—आपने कभी प्यार किया है? सवाल अप्रत्याशित था मगर कबीर ने बिना घबराए धीरे से कहा—हाँ, किया था, लेकिन निभा नहीं पाया, शायद वक्त या हालात की वजह से, या शायद मैं ही कायर था। पलक ने उसकी आँखों में झाँका और बोली—कभी-कभी प्यार अधूरा ही अच्छा लगता है, क्योंकि पूरा होने पर टूटने का डर रहता है। कबीर ने जवाब दिया—और अधूरा प्यार हमें ज़िंदा भी रखता है। दोनों कुछ देर खामोश रहे, मगर इस खामोशी में एक गहरी आत्मीयता थी, जैसे शब्दों की जगह उनकी साँसें बातें कर रही हों। ट्रेन अब अगले बड़े स्टेशन की ओर बढ़ रही थी, बाहर अंधेरे में गाँवों की बत्तियाँ दूर-दूर तक चमक रही थीं, और डिब्बे की खिड़की से आती ठंडी हवा ने पलक के चेहरे की लटों को बिखरा दिया, कबीर ने देखा और अनायास ही मन में सोचा—क्या यह सफ़र सचमुच एक रात का है या ज़िंदगी का मोड़? पलक ने उसकी नज़र महसूस की और नज़रें झुका लीं, मगर उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी, एक ऐसी मुस्कान जो बहुत कुछ कह रही थी।

 

भाग 4 – सफ़र की गहराई

ट्रेन रात के अंधेरे में जैसे किसी रहस्यमयी सुरंग से गुजर रही थी, खिड़की से बाहर सब धुंधला हो चुका था मगर भीतर एक ऐसी चमक थी जो सिर्फ़ दो आँखों में दिखाई दे रही थी, पलक की और कबीर की, दोनों अब लगातार बातें कर रहे थे, कभी हँसते कभी चुप हो जाते, जैसे हर शब्द के बीच एक नया रिश्ता बुना जा रहा हो, कबीर ने पूछा—आपको कभी ऐसा लगा है कि कोई अजनबी अचानक इतना करीब हो जाए कि बरसों का रिश्ता लगे? पलक ने धीरे से कहा—हाँ, शायद अभी, और बोलते ही वह मुस्कुरा दी, उसकी मुस्कान में हल्की झिझक भी थी और एक अनकही स्वीकारोक्ति भी। कबीर ने उसकी ओर गहराई से देखते हुए कहा—हो सकता है यही सफ़र हमें किसी मंज़िल तक न ले जाए, मगर ये कुछ पल ज़िंदगी भर याद रहेंगे। डिब्बे की बत्ती झिलमिलाई और खिड़की के बाहर अंधेरे में कहीं दूर मंदिर की घंटियाँ सुनाई दीं, पलक ने आँखें बंद कर लीं और बोली—कभी-कभी लगता है बनारस अभी भी हमारे साथ है, जैसे ट्रेन के पीछे-पीछे चल रहा हो। कबीर ने धीमे स्वर में कहा—शहर हमेशा हमारे भीतर रहता है, हम जहाँ जाएँ उसे साथ ले जाते हैं। पलक ने उसकी ओर देखा और अचानक पूछ बैठी—आप लिखते क्यों हैं? कबीर ने थोड़ा सोचकर कहा—शायद इसलिए कि जो बातें कह नहीं पाता उन्हें काग़ज़ पर उतार दूँ, मगर सच कहूँ तो डरता हूँ कि कहीं वो शब्द मुझे ही आईना न दिखा दें। पलक ने मुस्कुराकर कहा—आईना ज़रूरी है, क्योंकि वही हमें हमारी सच्चाई बताता है। उनकी बातचीत का ये दौर अब इतना सहज हो चुका था कि नींद जैसे दोनों से कोसों दूर भाग गई थी, जबकि डिब्बे के बाकी लोग सपनों में खो चुके थे। ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर रुकी, बाहर ठंडी हवा का झोंका आया, कुछ लोग उतरे, कुछ चढ़े, और प्लेटफ़ॉर्म की चाय-पकौड़े की महक अंदर तक फैल गई। कबीर ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—चलो, चाय पीते हैं। दोनों उतरे और प्लेटफ़ॉर्म की बेंच पर बैठकर कुल्हड़ वाली चाय का स्वाद लिया, आधी रात की खामोशी, चाय की भाप और सामने रुकी ट्रेन की लंबी कतार—ये सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बना रहे थे जिसे दोनों हमेशा याद रखने वाले थे। पलक ने कुल्हड़ में झाँकते हुए कहा—अजीब है, इतनी रात को भी इस शहर की धड़कन थमती नहीं। कबीर ने जवाब दिया—क्योंकि कुछ जगहें अमर होती हैं। फिर दोनों लौट आए और ट्रेन ने फिर से रफ़्तार पकड़ ली। पलक अब खिड़की के बाहर नहीं देख रही थी, उसकी नज़रें कबीर पर टिक गई थीं, उसने धीमे स्वर में कहा—अगर ये सफ़र सुबह खत्म हो जाएगा तो क्या होगा? कबीर ने गहरी साँस लेकर कहा—कुछ सफ़र कभी खत्म नहीं होते, बस हम उतर जाते हैं और रास्ता चलता रहता है। पलक ने उसकी ओर देखते हुए कहा—तो क्या हम भी उतरकर खत्म हो जाएँगे? कबीर ने हल्की मुस्कान दी—नहीं, शायद ये शुरुआत है। दोनों की आँखें फिर टकराईं और इस बार उनमें कोई सवाल नहीं था, सिर्फ़ एक भरोसा था, एक ऐसा भरोसा जो उन्हें अजनबी से कहीं अधिक करीब बना चुका था।

 

भाग 5 – धुंधले राज़

रात अब और गहरी हो चुकी थी, ट्रेन खिड़कियों के बाहर अंधेरे को चीरते हुए किसी अनजानी दिशा में भाग रही थी और डिब्बे की पीली रोशनी में कबीर और पलक की बातचीत एक नए मोड़ पर पहुँच गई थी, दोनों इतने सहज हो चुके थे कि अब अपनी ज़िंदगी के ऐसे हिस्से खोल रहे थे जिन्हें शायद उन्होंने कभी किसी और से साझा नहीं किया था, कबीर ने धीमे स्वर में कहा—मैंने बनारस इसलिए छोड़ा क्योंकि हर गली मुझे उस चेहरे की याद दिलाती थी जिसे मैं खो चुका हूँ, पलक चुपचाप उसकी आँखों में झाँकती रही, उसने पूछा—कौन था वो? कबीर ने हिचकिचाते हुए कहा—एक लड़की, कॉलेज में मिली थी, बहुत करीब थी, मगर हालात ने हमें अलग कर दिया, और मैंने लिखना उसी से शुरू किया, मगर हर पन्ना उसकी याद में जलता रहा, इसलिए मैंने सब फाड़ डाले, मगर फिर भी उससे छुटकारा नहीं मिला, जैसे बनारस से छुटकारा नहीं मिलता। पलक ने उसकी बात सुनकर अपना हाथ धीरे से उसकी ओर बढ़ा दिया और बोली—कभी-कभी कुछ लोग हमारे भीतर ऐसे घर बना लेते हैं जिनसे हम बाहर निकल ही नहीं पाते, मगर शायद हमें नए घर भी बनाने चाहिए। कबीर उसकी उंगलियों का हल्का स्पर्श महसूस कर रहा था, उसके मन में अजीब-सा सुकून उतर रहा था। पलक ने कुछ देर बाद अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा—मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, मैं दिल्ली में रहती हूँ, काम करती हूँ, लोग मुझे दोस्तों से घिरी हुई लड़की समझते हैं, मगर सच ये है कि मैं भीतर से हमेशा अकेली रही हूँ, क्योंकि जिस इंसान पर भरोसा किया उसने ही मुझे तोड़ दिया, और तब से मैं भी किसी पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं कर पाई। कबीर ने धीरे से कहा—तो फिर आप अकेली सफ़र क्यों कर रही हैं? पलक ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—शायद इसलिए कि अकेलापन सिर्फ़ कमरे में नहीं, सफ़र में भी होता है, फर्क इतना है कि यहाँ हवा साथ देती है। दोनों की आँखों में एक अनकहा दर्द था, मगर उसी दर्द ने उन्हें एक-दूसरे के और करीब कर दिया। ट्रेन अब किसी पुल से गुजर रही थी, नीचे दूर नदी चमक रही थी, और ऊपर आसमान में टूटता हुआ तारा दिखाई दिया, पलक ने अनायास कहा—इच्छा माँग लीजिए। कबीर ने उसकी ओर देखा और कहा—अगर इच्छा आपको कहनी हो तो क्या माँगेंगी? पलक ने नज़रें झुका लीं और बोली—शायद एक और सफ़र, आपके साथ। कबीर का दिल धक से रह गया, मगर उसने कुछ कहा नहीं, बस बाहर आसमान की ओर देखा और मन ही मन प्रार्थना की कि यह सफ़र सुबह की मंज़िल पर खत्म न हो। डिब्बे में हल्की-हल्की खामोशी लौट आई थी, कुछ लोग करवट बदल रहे थे, कोई बच्चा नींद में बड़बड़ा रहा था, मगर इस हलचल के बीच दोनों की आत्माएँ जैसे गहरी खामोशी में डूब चुकी थीं। कबीर ने धीरे से कहा—कभी-कभी लगता है हम ट्रेन की तरह हैं, दौड़ते रहते हैं, किसी मंज़िल की ओर, मगर सच ये है कि सफ़र ही असली कहानी है। पलक ने उसकी ओर देखते हुए कहा—और अगर हम उतर जाएँ, तब भी कहानी खत्म नहीं होती, शायद किसी और पटरी पर चलती रहती है। उनके शब्द अब साधारण बातचीत नहीं थे, बल्कि किसी कविता के टुकड़े लग रहे थे, जो खिड़की से आती हवा में घुलकर रात के अंधेरे में गुम हो रहे थे। पलक ने मुस्कुराते हुए कहा—कबीर, अगर ये सब एक कहानी हो तो क्या इसका नाम होगा? कबीर ने बिना सोचे जवाब दिया—आख़िरी ट्रेन टू बनारस। पलक की आँखें चमक उठीं, उसने धीरे से कहा—तो फिर ये कहानी अभी शुरू हुई है।

 

भाग 6 – सुबह की आहट

ट्रेन अब रात के उस मोड़ पर पहुँच चुकी थी जहाँ अंधेरा धीरे-धीरे टूटने लगता है, खिड़की के बाहर आसमान में हल्की नीली रेखाएँ खिंच रही थीं, पंछियों की धीमी चहचहाहट भी कहीं दूर से सुनाई दे रही थी और डिब्बे में बैठे थके हुए यात्री करवटें बदलते हुए जैसे सुबह का इंतज़ार कर रहे थे, पलक ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—देखिए, रात खत्म हो रही है, कबीर ने उसकी ओर देखकर कहा—शायद रात कभी खत्म नहीं होती, बस दिन उस पर चादर डाल देता है, पलक ने हौले से हँसते हुए कहा—आप हर बात में कविता ढूँढ लेते हैं, कबीर ने जवाब दिया—क्योंकि शब्दों से ही मैं जीता हूँ, वरना भीतर तो बस खालीपन है। पलक ने उसकी आँखों में देखा और कहा—मगर अभी ये खालीपन नहीं लग रहा, ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों मिलकर उसे भर रहे हैं। दोनों चुप हो गए, मगर इस चुप्पी में एक गहरी आत्मीयता थी, ट्रेन तेज़ी से भाग रही थी और हवा में नमी की खुशबू घुल रही थी। पलक ने धीरे-धीरे अपनी बैग से एक छोटी डायरी निकाली और कबीर की ओर बढ़ाते हुए कहा—ये मेरी लिखी हुई बातें हैं, किसी को कभी नहीं दिखाईं, मगर आज मन कर रहा है कि आपको दूँ, कबीर ने डायरी खोली, पन्नों पर लिखी अधूरी पंक्तियाँ, टूटे-फूटे वाक्य और कुछ आँसुओं से धुंधले शब्द देखकर उसका दिल भर आया, उसने धीरे से कहा—ये सब अधूरी नहीं, बल्कि सच्ची हैं, और यही इन्हें खूबसूरत बनाती है। पलक ने पहली बार किसी और की नज़रों में अपने दर्द को सच्चा होते देखा और उसकी आँखें नम हो गईं, कबीर ने डायरी बंद करके उसे वापस दी और कहा—शायद हमें अधूरी कहानियाँ ही पूरी करती हैं। डिब्बे में अब हल्की हलचल होने लगी थी, चाय वाले की आवाज़ गूँज रही थी—गरम चाय, गरम चाय, कबीर उठकर बाहर गया और दो कुल्हड़ लेकर लौटा, पलक ने गरम चाय के घूँट के साथ मुस्कुराकर कहा—कभी-कभी लगता है ये कुल्हड़ हमें जोड़ देते हैं, जैसे मिट्टी से इंसान फिर इंसान बनता है। कबीर ने जवाब दिया—हाँ, और टूटकर भी खुशबू छोड़ जाते हैं। दोनों की मुस्कुराहटों में अब एक स्थिरता थी, जैसे रात की बेचैनी सुबह की धूप में बदल रही हो। ट्रेन एक छोटे कस्बे के स्टेशन पर रुकी, बाहर किसान बैलगाड़ी पर सब्ज़ियाँ लाद रहे थे, बच्चे स्कूल की वर्दी में भागते हुए प्लेटफ़ॉर्म पार कर रहे थे, और यह सब देखकर पलक ने कहा—अजीब है, हम सफ़र में होते हैं मगर ज़िंदगी हमें बताती है कि हर कोई अपनी-अपनी दौड़ में है। कबीर ने सिर हिलाते हुए कहा—और हमें लगता है कि हमारा सफ़र ही सबसे कठिन है, जबकि हर डिब्बे, हर स्टेशन पर कहानियाँ हैं। दोनों अब चुप थे, मगर इस चुप्पी में भी बहुत कुछ कहा जा चुका था, बाहर आसमान धीरे-धीरे सुनहरा हो रहा था, सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आई और पलक के चेहरे पर पड़ी, कबीर ने उस रोशनी में उसे देखा और मन ही मन सोचने लगा कि शायद उसने सुबह कभी इतनी खूबसूरत नहीं देखी थी। पलक ने उसकी नज़र महसूस की और हल्के से मुस्कुराई, उसने कहा—सुबहें हमेशा उम्मीद लाती हैं, मगर कभी-कभी डर भी कि क्या ये उम्मीद टिकेगी, कबीर ने गहरी साँस लेकर कहा—शायद टिके या नहीं, मगर सफ़र के ये पल हमें ज़िंदगी भर के लिए मिल गए हैं। ट्रेन फिर से आगे बढ़ी और बाहर खेतों में काम शुरू हो चुका था, सुबह की ताज़गी हवा में भर गई थी, और इस ताज़गी के बीच कबीर और पलक की आँखों में अब कोई झिझक नहीं थी, बस एक अनकहा भरोसा था कि ये आख़िरी ट्रेन शायद उनकी पहली कहानी लिख रही है।

भाग 7 – अनकही कबूलियाँ

सुबह अब पूरी तरह उजल चुकी थी, खिड़कियों से बाहर खेतों में धूप बिखरी थी, गाँव के लोग बैलगाड़ियों के साथ खेतों की ओर जा रहे थे, छोटे कस्बों के स्टेशन पर बच्चे किताबें दबाए भागते हुए दिख रहे थे और ट्रेन के भीतर भीड़ थोड़ी सजग हो चुकी थी, कोई अपना सामान ठीक कर रहा था, कोई चाय के कुल्हड़ को खिड़की से बाहर फेंक रहा था, मगर इस हलचल के बीच कबीर और पलक एक अलग ही दुनिया में थे, दोनों की नज़रें जैसे एक-दूसरे से हट ही नहीं रही थीं, पलक ने अचानक धीमे स्वर में कहा—कबीर, क्या आपको लगता है कि ये जो कुछ हमारे बीच हो रहा है वो सिर्फ़ सफ़र का जादू है? कबीर ने थोड़ी देर चुप रहकर उसकी आँखों में झाँका और बोला—नहीं, सफ़र सिर्फ़ बहाना है, असली कहानी तो हम हैं, शायद किस्मत ने हमें एक ही डिब्बे में बिठा दिया ताकि हम ये मान लें कि कुछ मुलाक़ातें तय होती हैं। पलक ने मुस्कुराकर कहा—मगर डर तो अभी भी है, क्या होगा जब ये सफ़र खत्म होगा, जब हम दिल्ली उतरेंगे और भीड़ हमें अलग कर देगी? कबीर ने उसकी ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा—शायद हमें भीड़ से डरना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि अगर कोई रिश्ता सच्चा है तो उसे भीड़ कभी अलग नहीं कर सकती। पलक ने उसका हाथ थाम लिया और उसकी आँखें भर आईं, उसने धीरे से कहा—आपको पता है मैंने कभी किसी अजनबी से इतना कुछ साझा नहीं किया जितना आपसे इस एक रात में किया है। कबीर ने हल्के से हँसते हुए कहा—तो अब हम अजनबी नहीं रहे, है न? पलक ने उसकी ओर देख कर सिर हिला दिया, मगर उसकी आँखों में अनगिनत सवाल थे, जिनमें सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या ये रिश्ता दिल्ली पहुँचते ही रुक जाएगा या सफ़र की तरह चलता रहेगा। ट्रेन एक बड़े स्टेशन पर रुकी, बाहर भीड़ उमड़ी, फेरीवाले चिल्लाए, कुलियों ने सामान उठाया, यात्रियों का शोर बढ़ा, मगर इस शोरगुल के बीच पलक और कबीर की खामोशी और गहरी हो गई, जैसे बाहर की दुनिया से उनका कोई लेना-देना ही न हो। पलक ने धीमी आवाज़ में कहा—क्या आपने कभी सोचा था कि ज़िंदगी इतनी अचानक बदल सकती है? कबीर ने जवाब दिया—नहीं, मगर यही तो इसकी खूबसूरती है, हम सोचते कुछ हैं और हो कुछ और जाता है। दोनों के बीच अब कोई औपचारिकता नहीं बची थी, वे इतने करीब बैठ गए थे कि उनकी साँसें एक-दूसरे से टकराने लगीं, बाहर सूरज और तेज़ हो गया था और उसकी रोशनी ने डिब्बे को सुनहरे रंग में रंग दिया था। पलक ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—काश ये सफ़र कभी खत्म न हो। कबीर ने उसकी ओर देखा और धीरे से बोला—कभी-कभी सफ़र खत्म नहीं होते, बस मंज़िल बदल जाती है। दोनों मुस्कुरा दिए मगर उनके दिलों में एक ही डर था—दिल्ली। दिल्ली जहाँ ट्रेन रुकेगी, जहाँ ये रात, ये बातें और ये नज़दीकियाँ याद बन जाएँगी। मगर शायद किस्मत को अभी और कुछ लिखना था।

भाग 8 – मंज़िल या शुरुआत

सुबह अब पूरी तरह चमक उठी थी, ट्रेन दिल्ली के बाहरी इलाक़ों से गुजर रही थी, खिड़की से बाहर गगनचुंबी इमारतें, सड़कों पर भागती गाड़ियाँ और सुबह की भागदौड़ दिखाई दे रही थी, डिब्बे के भीतर भी यात्री अपने सामान समेटने लगे थे, कोई सूटकेस को नीचे खींच रहा था, कोई बच्चे को जगाकर कह रहा था कि अब उतरने की तैयारी करो, और इसी अफ़रातफ़री के बीच कबीर और पलक चुपचाप एक-दूसरे को देख रहे थे, जैसे दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे कि अब आगे क्या कहना है, कबीर ने हल्की आवाज़ में कहा—तो ये सफ़र यहीं खत्म? पलक ने नज़रें झुकाकर कहा—शायद सफ़र यहीं तक था, मगर कहानी? कबीर ने गहरी साँस लेकर कहा—कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं, बस हम उन्हें वहीं छोड़ देते हैं, पलक ने मुस्कुराते हुए कहा—तो फिर हमें छोड़ना नहीं चाहिए। ट्रेन ने सीटी दी और धीरे-धीरे प्लेटफ़ॉर्म में प्रवेश करने लगी, बाहर स्टेशन पर भीड़ उमड़ पड़ी थी, कुलियों की आवाज़ें, चायवालों का शोर, गाड़ियों की सीटी—सब मिलकर एक बेचैन तस्वीर बना रहे थे, मगर उनके बीच एक अजीब-सी शांति थी, जैसे यह शोर उन्हें छू ही नहीं पा रहा था। ट्रेन रुकी, लोग धक्का-मुक्की करते हुए उतरने लगे, कबीर और पलक भी खड़े हो गए, दोनों के हाथ एक पल के लिए फिर छू गए और इस बार उन्होंने हाथ नहीं छोड़ा, भीड़ में से रास्ता बनाते हुए वे प्लेटफ़ॉर्म पर उतरे, पलक ने चारों ओर देखा और कहा—कितना अजीब है, यहाँ सबकी मंज़िलें अलग-अलग हैं, मगर हमारी? कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—अगर आप चाहें तो एक ही हो सकती है। पलक की आँखें चमक उठीं, उसने धीरे से कहा—शायद किस्मत ने हमें सिर्फ़ इस ट्रेन के लिए नहीं मिलवाया। वे दोनों स्टेशन की भीड़ से निकलकर बाहर आए, टैक्सियों की कतार लगी थी, लोग हड़बड़ी में गाड़ियाँ पकड़ रहे थे, मगर पलक और कबीर धीरे-धीरे चलते रहे, जैसे उनके पास अब किसी मंज़िल की जल्दी नहीं, कबीर ने पूछा—आप कहाँ जाएँगी? पलक ने हल्की हँसी में कहा—जहाँ आप ले जाएँगे। कबीर के होंठों पर मुस्कान तैर गई, उसने कहा—तो चलिए, इस सफ़र को यहीं खत्म न होने दें। दोनों ने एक टैक्सी पकड़ी और उसमें बैठ गए, बाहर दिल्ली की सड़कों पर भीड़ उमड़ रही थी, हॉर्न बज रहे थे, मगर टैक्सी के भीतर सन्नाटा और सुकून था, पलक ने खिड़की से बाहर झाँका और धीरे से कहा—आख़िरी ट्रेन टू बनारस अब शायद पहली टैक्सी टू हमारी कहानी है। कबीर ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा—हाँ, और अब ये सफ़र हमारा है। टैक्सी आगे बढ़ी और दोनों ने महसूस किया कि शायद ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत कहानियाँ वही होती हैं जो अचानक शुरू होती हैं और कभी खत्म नहीं होतीं, ठीक उसी आख़िरी ट्रेन की तरह जो बनारस से चली थी और उन्हें एक-दूसरे तक ले आई थी।

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