अमूलिक त्रिपाठी
संगम के आकाश में
संगम नगरी इलाहाबाद की सुबहें कुछ अलग होती हैं। जब सूरज यमुना के ऊपर से अपना नारंगी उजाला धीरे-धीरे फैलाना शुरू करता है, तब शहर की संकरी गलियों से आवाज़ें आने लगती हैं—“पेच दे!” “ढील दे!” “अब कटेगी!”
यही पतंगबाज़ी की शुरुआत होती है।
नौवी कक्षा का छात्र अर्जुन मिश्रा उन लड़कों में से था जिनके लिए पतंगबाज़ी सिर्फ एक खेल नहीं, इज़्ज़त का सवाल थी। उसकी आँखों में संगम के आकाश को जीतने का सपना था। माघ मेले की भीड़, कुंभ की तैयारियाँ, और आस्था की बाढ़ में भी अर्जुन की नजरें आसमान में उस पतंग पर टिकी रहतीं जिसे वो “राजा की तलवार” कहता था। सफेद रंग की वह पतंग, जिसके कोने पर लाल धारियाँ थीं, अर्जुन की सबसे खास पतंग थी।
“दादू, आज नई डोर लानी है,” अर्जुन ने छत पर बैठे अपने दादा जी से कहा, जो पुराने ज़माने के पतंगबाज़ हुआ करते थे।
दादा जी मुस्कराए। “नई डोर से ज़्यादा ज़रूरी है सही अंदाज़। पेच में कला होनी चाहिए, गुस्सा नहीं।”
“लेकिन दादू, सामने वाले छज्जे पर इमरान भाई ने कल हमारी ‘बिजली’ पतंग काट दी। अब तो मुकाबला बनता है!” अर्जुन ने ताव से कहा।
इलाहाबाद के पुरानी कचहरी मोहल्ले में अर्जुन और इमरान की पतंगबाज़ी की टक्कर पूरे शहर की चर्चा बन चुकी थी। एक हिन्दू लड़का, एक मुसलमान लड़का—दोनों बचपन से दोस्त, पर छत पर दुश्मन।
इमरान के अब्बू, मोहम्मद यूसुफ़, नगर निगम में काम करते थे। उनके घर की छत पर दो बड़े बांस के खंभे लगे थे जिन पर हर रोज़ दसियों पतंगें सूखती थीं। अर्जुन की छत पर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी, लेकिन उसके अंदर जुनून था, जो शायद शहर की हवाओं से भी तेज़ उड़ता था।
उस रविवार को माघ मेला शुरू होने वाला था। घाटों पर भक्तों की भीड़, साधुओं की जमात, और पूरे शहर में एक अद्भुत हलचल थी। लेकिन अर्जुन और इमरान की दुनिया वहीं थी—छत, डोर, चरखी, और वो नीलगगन जहां सपनों की पतंगें उड़ती थीं।
उस सुबह अर्जुन ने खास तैयारी की थी। नींबू, मंजन, और कांच पीस कर ‘मांझा’ तैयार किया गया था। यह काम उसके दोस्त नीलू और राहुल ने किया था, जो अर्जुन की टीम के सदस्य थे।
दोपहर १२ बजे का समय तय हुआ था—‘महायुद्ध’। इमरान की पतंग का नाम था “शहंशाह”। गहरे काले रंग की पतंग जिसमें सुनहरी धारियाँ थीं। अर्जुन ने “राजा की तलवार” को पूरी शिद्दत से चरखी पर लपेटा।
“पेच चालू!” नीलू चिल्लाया।
अब पूरा मोहल्ला छतों पर खड़ा था। जैसे कोई रोमांचक क्रिकेट मैच चल रहा हो।
“ढील दे अर्जुन! ढील दे!” दादा जी की आवाज़ आई।
“खींच! अब खींच! पेच काट!” नीलू ने चरखी खींचते हुए कहा।
और तभी, “स्ट्रिंग!” की आवाज़ आई और “शहंशाह” हवा में लहराता हुआ नीचे गिर पड़ा।
पूरा मोहल्ला तालियों से गूंज उठा। बच्चे “वो काटा!” कहते हुए उस कटी हुई पतंग को पकड़ने दौड़ पड़े। अर्जुन ने जीत के भाव से आसमान की ओर देखा, जैसे कोई योद्धा युद्ध जीत चुका हो।
लेकिन तभी दादा जी ने गंभीर स्वर में कहा, “युद्ध जितना आसान है, दोस्ती को बचाना मुश्किल होता है।”
अर्जुन चुप हो गया। उसने नीचे झांका, तो देखा—इमरान छत की मुंडेर पर चुपचाप खड़ा था। उसकी आँखें पतंग की तरह ही खाली थीं।
अर्जुन ने अपनी पतंग नीचे रखी और सीढ़ियाँ उतरता चला गया।
कटे पतंग और कटी दोस्ती
इलाहाबाद की शामें भी किसी बूढ़े कवि की तरह होती हैं—थोड़ी थकी, थोड़ी सजीव, और पूरी तरह उदासीन। उस दिन शाम को सूरज जैसे कुछ कहे बिना विदा ले रहा था। अर्जुन की जीत के बाद भी मोहल्ले की हवा में कुछ खामोशी थी। वह शोर, जो जीत के बाद होना चाहिए था, बस बच्चों की आवाज़ों तक सिमट गया था।
इमरान की छत सूनी थी। उसकी “शहंशाह” पतंग अब किसी बच्चे की पकड़ में थी, जो उसे अपने घर की दीवार पर चिपकाकर सोच रहा होगा कि ये उसकी जीत की निशानी है।
अर्जुन अपने कमरे में बैठा था, हाथ में डोरी और मांझा, लेकिन मन कहीं और था।
“तू बहुत अच्छा लड़ा बेटा,” दादा जी ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
“मगर दादा जी, इमरान कुछ नहीं बोला… एक बार भी नहीं।”
दादा जी मुस्कराए नहीं, बस बोले, “हर पेच में एक हार होती है। पर हर हार में एक चुप्पी होती है, जो दोस्त को तोड़ भी सकती है और जोड़ भी सकती है।”
अतीत की डोर
अर्जुन और इमरान की दोस्ती की शुरुआत भी पतंग से ही हुई थी। वह तब की बात थी जब दोनों तीसरी कक्षा में थे। अर्जुन की पतंग एक पेड़ पर फँस गई थी और वह रो रहा था। तब इमरान ने पहली बार उसे देखा, पास आया और बिना कुछ कहे पेड़ पर चढ़कर पतंग उतार लाया। उस दिन से दोनों की छतें जोड़ने वाली दीवार नहीं, एक डोरी बन गई थी।
वे एक-दूसरे के घर में उतनी ही आसानी से आते-जाते थे जितनी आसानी से उनकी पतंगें आकाश में घूमती थीं। इमरान की अम्मी अर्जुन को सेवइयाँ खिलाती थीं, तो अर्जुन की माँ इमरान के लिए बेसन के लड्डू रखती थीं।
लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, मुकाबला भी बढ़ा। और धीरे-धीरे खेल में अहंकार की मिलावट होने लगी।
मौन का मंज़र
अर्जुन ने अगले दिन स्कूल में इमरान को देखा, लेकिन दोनों की नज़रें नहीं मिलीं। न तो ‘हाय’ कहा, न ‘हैलो’। रास्ता अलग था, लेकिन मन एक-दूसरे के करीब ही भटक रहा था।
शाम को अर्जुन ने पतंग नहीं उड़ाई। वह बस छत पर बैठा रहा, डोरी की गाठें खोलता और फिर बाँधता रहा।
उसी वक्त नीलू और राहुल आए।
“क्यों भाई, आज मैदान खाली है! चलो उड़ाते हैं एक ‘बाज़’!”
अर्जुन ने सिर हिलाया, “नहीं यार, आज मन नहीं है।”
नीलू ने हँसते हुए कहा, “क्यों? इमरान की याद सता रही है क्या?”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।
उसी रात दादा जी ने एक पुराना डिब्बा निकाला। उसके अंदर एक पतंग थी—पीली, किनारे पर नीली धारियाँ।
“ये देख बेटा। ये मेरी आखिरी पतंग है। इसे मैंने अपने दोस्त रमज़ान भाई के साथ उड़ाई थी। 1967 का कुंभ था तब। एक हिंदू, एक मुसलमान—एक पतंग, एक डोरी।”
अर्जुन ने चुपचाप वह पतंग हाथ में ली। वह हल्की थी, लेकिन उसके अंदर जैसे इतिहास भरा था।
“क्या हुआ फिर?”
“वो दोस्ती अब तक ज़िंदा है। पिछले हफ्ते ही उनका खत आया था—’इस बार साथ पतंग उड़ाएँगे’।”
अर्जुन के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
डोर फिर जुड़ती है
अगले दिन शाम को अर्जुन एक पतंग, दो चरखियाँ और एक चिट्ठी लेकर इमरान की छत पर गया।
इमरान वहीं मुंडेर पर बैठा था। अर्जुन ने कुछ नहीं कहा, बस उसके पास आकर बैठ गया। फिर वह चिट्ठी उसकी ओर बढ़ाई।
इमरान ने पढ़ा:
“पेच में तू जीता या मैं—ये मायने नहीं रखता। मायने रखती है वो डोर जो तुझसे जुड़ी थी, बचपन से। अगर तुझे लगे कि दोस्ती अब भी ज़िंदा है, तो आज शाम हम दोनों मिलकर पतंग उड़ाएँगे—एक साथ।”
इमरान ने चुपचाप देखा। फिर धीमे से मुस्कराया। “तो कौनसी पतंग है आज की?”
“दादा जी की पुरानी ‘दोस्ती’,” अर्जुन ने कहा।
दोनों ने मिलकर पतंग बाँधी, मांझा चढ़ाया, और आकाश में उड़ा दी।
और उस दिन, संगम के आकाश में सिर्फ पतंग नहीं उड़ रही थी—दोस्ती भी उड़ रही थी, नई ऊँचाइयों की ओर।
ताव, तूफ़ान और त्योहार
इलाहाबाद में जनवरी की हवा में एक अजीब सी सरसराहट होती है—ठंडी, मगर लड़ने को तैयार। माघ मेले का शोर, संगम की रौनक, और छतों से आती डोर की आवाज़ें इस शहर को जीवित रखती हैं।
अर्जुन और इमरान की दोस्ती दोबारा जुड़ चुकी थी, और अब वे एक ही टीम में थे। “टीम संगम”—यह नाम रखा गया था उनकी संयुक्त पतंगबाज़ी टीम का, जिसमें अब मोहल्ले के कई और लड़के जुड़ने लगे थे।
लेकिन जहां दोस्ती हो, वहां जलन भी होती है। और जहां पतंग हो, वहां मुकाबला भी ज़रूरी होता है।
नया खिलाड़ी
मोहल्ले में इन दिनों एक नई हलचल थी। सामने वाले मोहल्ले—रामबाग से एक नया खिलाड़ी आया था—विवेक अग्रवाल। दसवीं का छात्र, लेकिन पतंगबाज़ी में माहिर।
कहते थे, उसकी डोर इतनी धारदार होती थी कि हवा में ही दूसरी पतंग की सांस बंद कर देती थी। और उसकी पतंग का नाम था—“आंधी।”
विवेक ने मोहल्ले में आते ही तीन पतंगें एक साथ काटीं। लोग हैरान थे, अर्जुन और इमरान भी।
“भाई, ये लड़का तो खतरनाक है,” नीलू ने कहा।
“हमें मुकाबला करना ही होगा,” अर्जुन बोला, “लेकिन पहले जानना होगा कि उसका तरीका क्या है।”
तैयारी
अर्जुन और इमरान ने योजना बनाई। उन्होंने घाट की उस दुकान से मांझा मंगवाया जो शहर में सबसे धारदार मांझे के लिए मशहूर थी—“राजू पतंग वाले।”
रात में छत पर बैठकर दोनों ने मांझे को नींबू, मंजन, कांच और गोंद के मिश्रण से मजबूत किया। मांझे को सूखने में चार घंटे लगे।
“कल सुबह ठीक नौ बजे,” इमरान बोला, “महामुकाबला।”
“ठीक है। लेकिन इस बार जीत सिर्फ पेच से नहीं, दिल से होनी चाहिए,” अर्जुन ने कहा।
तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी
अगले दिन पूरा मोहल्ला छतों पर था। दुकानों की छतें, घरों की मुंडेरें, स्कूल की छत—हर जगह लोग जमा थे। विवेक, अपनी छत के कोने पर खड़ा था, एक हाथ में चरखी और दूसरे में “आंधी” पतंग।
अर्जुन और इमरान ने अपनी खास पतंग चुनी थी—“संगम रक्षक”। यह लाल-सफेद रंग की मिलीजुली पतंग थी, जिसमें ऊपर “टीम संगम” लिखा था।
“शुरुआत मैं करूंगा,” इमरान बोला।
“पेच चालू!” नीलू ने चिल्लाया।
आसमान की जंग
पहली मुठभेड़ में ही विवेक ने नीलू की “बुलबुल” पतंग को काट डाला।
“भाई! ये तो सच्ची ‘आंधी’ है,” राहुल चिल्लाया।
अब बारी थी इमरान की।
उसने मांझे को ढील दी, फिर खींचा—और पेच शुरू हुआ। हवा में पतंगें नाच रहीं थीं, जैसे दो योद्धा तलवारबाज़ी कर रहे हों।
“खींच!” “ढील दे!” “अब!” – आवाज़ें गूंज रही थीं।
फिर एक तेज़ झटका। “काटा!” भीड़ से आवाज़ आई।
लेकिन…
कटने वाली पतंग “संगम रक्षक” थी।
पूरा मोहल्ला चुप।
इमरान ने चरखी नीचे रखी। अर्जुन ने उसकी पीठ थपथपाई।
“एक हार से लड़ाई खत्म नहीं होती,” अर्जुन बोला।
अब उसकी बारी थी।
अर्जुन की चाल
अर्जुन ने अपनी सबसे पुरानी और सबसे भरोसेमंद पतंग निकाली—“राजा की तलवार”। वह पतंग जो कभी इमरान ने काटी थी, और जिस वजह से दोस्ती टूटी थी।
विवेक ने “आंधी 2.0” उड़ाई—नई, तेज, और चमकदार।
पेच शुरू हुआ।
हवा में दो अलग-अलग संस्कृतियों, दो मोहल्लों, दो सिद्धांतों की लड़ाई हो रही थी। लेकिन इस बार अर्जुन ने जो मांझा इस्तेमाल किया था, उसमें सिर्फ धार नहीं, अनुभव भी था।
“खींच! अब छोड़!” दादा जी की आवाज़ आई।
एक आखिरी खींच… और “आंधी 2.0” धरती की ओर गिरने लगी।
तालियों की गूंज!
मोहल्ला जीत गया।
तूफ़ान के बाद
विवेक छत की सीढ़ियों पर बैठ गया, चुपचाप।
अर्जुन और इमरान नीचे उतरे।
“अच्छा खेला यार,” अर्जुन ने हाथ आगे बढ़ाया।
विवेक ने देखा, फिर धीरे से हाथ मिलाया।
“मुझे नहीं पता था, इलाहाबाद की हवा इतनी सख्त भी हो सकती है,” उसने हँसते हुए कहा।
“यहाँ की हवा दोस्ती में भी उड़ती है और जंग में भी,” इमरान बोला।
त्योहार
तीन दिन बाद वसंत पंचमी थी। पूरा शहर पीले रंग से सराबोर था। पतंगें, फूल, कपड़े, और मिठाइयाँ—हर जगह बस उल्लास।
“टीम संगम” ने एक खास पहल की। उन्होंने मोहल्ले के बच्चों को पतंग उड़ाना सिखाने का आयोजन रखा।
अर्जुन, इमरान, विवेक और बाकी सभी दोस्त बच्चों के साथ समय बिता रहे थे। अब कोई प्रतियोगिता नहीं थी—सिर्फ प्रेम, खेल और आकाश।
वह आख़िरी पतंग
वसंत पंचमी बीत चुकी थी। संगम नगरी एक बार फिर अपने सामान्य लय में लौट रही थी। घाट पर साधुओं की टोली कम दिखती थी, और छतों पर भी पतंगों की संख्या घटने लगी थी।
लेकिन अर्जुन के दिल में अभी एक उड़ान बाकी थी। एक आख़िरी उड़ान, एक आख़िरी पतंग, जिसे वह अपने दादाजी के साथ उड़ाना चाहता था।
बदलते वक्त की चाल
दादा जी अब ज़्यादा देर तक छत पर नहीं बैठ पाते थे। उनकी सांसें धीमी हो गई थीं, और चाल में वो पुराना जोश नहीं था। डॉक्टर ने आराम की सलाह दी थी।
“अब पतंग नहीं, बेटा। अब बस यादें उड़ती हैं,” उन्होंने एक दिन धीमे से कहा।
“पर दादू, आप ही तो कहते थे, पतंगें इंसान के सपनों की तरह होती हैं—जैसे उड़ती हैं, वैसे ही गिरती भी हैं… लेकिन गिरने से पहले वो पूरी दुनिया देख लेती हैं।”
दादा जी मुस्कराए। “तो आज आख़िरी पतंग उड़ाई जाए?”
“हाँ दादू, आज संगम के ऊपर आपकी उड़ान होगी।”
आख़िरी पतंग
अर्जुन ने वह पीली-नीली पतंग निकाली जिसे दादा जी ने वर्षों पहले रमज़ान भाई के साथ उड़ाया था। डोरी पुरानी थी, लेकिन मांझा नया। चरखी भी दादा जी की थी, लकड़ी की बनी हुई।
इमरान, विवेक, नीलू, राहुल—all were there. सब जानते थे—आज सिर्फ पतंग नहीं उड़नी थी, एक युग को विदा देनी थी।
दादा जी छत की कुर्सी पर बैठे थे। अर्जुन ने पतंग उड़ाई, फिर डोरी दादा जी को थमा दी।
हवा धीमी थी, लेकिन पतंग आसमान में धीरे-धीरे चढ़ने लगी।
“धीरे खींचो… अब ढील दो… अब देखो—ये होती है सही लहर में पकड़,” दादा जी की आँखों में वही चमक थी, जो बचपन में अर्जुन ने देखी थी।
पूरा मोहल्ला चुपचाप खड़ा था—जैसे कोई पुराना राग चल रहा हो।
वह मोड़
तभी अचानक हवा तेज़ हुई। पतंग झूलने लगी। दादा जी ने मांझा कसा, फिर थोड़ा ढीला किया।
और फिर—वह क्षण आया।
“दादू, अब ढील…!”
लेकिन दादा जी की उंगलियाँ डोरी पर ढीली पड़ी थीं। उनके हाथ ठंडे हो चुके थे। आँखें आसमान की ओर टिकी रहीं… और फिर… स्थिर हो गईं।
पतंग अब भी उड़ रही थी।
शहर की छतें और आंखें
अर्जुन ज़ोर से चीखा—“दादू!!”
पूरा मोहल्ला नीचे उतर आया। इमरान ने अर्जुन को पकड़ा। विवेक ने डॉक्टर को बुलाया। लेकिन… देर हो चुकी थी।
दादाजी ने उसी क्षण दुनिया छोड़ दी, जिस क्षण उनकी पतंग आसमान की सबसे ऊँचाई पर थी।
विरासत
दस दिनों बाद अर्जुन ने दादा जी की तेरहवीं पर एक निर्णय लिया।
“अब हर वसंत पंचमी को हम एक ‘यादों की पतंग’ उड़ाएँगे—उन सबके नाम, जो हमारे साथ उड़ते रहे, और अब यादों में रह गए हैं।”
मोहल्ले ने इस परंपरा को स्वीकार किया।
अर्जुन और इमरान ने मिलकर एक क्लब बनाया—”पतंग संगम”—जहाँ बच्चे, बूढ़े, लड़के-लड़कियाँ, सब साथ मिलकर उड़ते, सिखते, और जोड़ते।
वह आख़िरी दृश्य
एक साल बाद, वसंत पंचमी पर अर्जुन छत पर खड़ा था।
आसमान में सैकड़ों पतंगें थीं, लेकिन उसकी नजर एक पर थी—पीली-नीली, धीमी उड़ान भरती हुई, जैसे कोई पुरानी रचना।
“देखा दादू… आप अब भी उड़ रहे हैं,” वह बुदबुदाया।
नीचे बच्चों की हँसी थी, ऊपर एक पतंग—और बीच में संगम का आकाश, जो अब सिर्फ नदी का मिलन स्थल नहीं था, बल्कि यादों, सपनों और रिश्तों का संगम बन चुका था।




