रवि शर्मा
1
शहर के बाहरी इलाके में एक वीरान मकान था, जिसके चारों तरफ कंटीली झाड़ियों का घेरा था। लोग कहते थे कि वहां रात में अजीब आवाजें सुनाई देती हैं। किसी ने बताया था कि सालों पहले वहां एक कत्ल हुआ था और वो मकान तब से वीरान पड़ा था।
इंस्पेक्टर राघवन को रात के ग्यारह बजे पुलिस कंट्रोल रूम से कॉल आया।
“सर, पुराना मकान… वहां चीखने की आवाजें आ रही हैं,” कांस्टेबल शर्मा ने घबराते हुए कहा।
राघवन ने तुरंत जीप स्टार्ट की और शर्मा के साथ मौके पर पहुँचा। मकान के दरवाजे पर ताला नहीं था, लेकिन अजीब सी खामोशी माहौल में तैर रही थी।
“कोई अंदर गया है?” राघवन ने कड़के हुए स्वर में पूछा।
“सर, लाइट की हल्की झलक दिखी थी, पर अंदर कौन है—पता नहीं,” शर्मा बोला।
राघवन ने पिस्तौल संभाली और दरवाज़ा धीरे से खोला। पुरानी लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमरा उठीं। एक कमरे से धीमी-धीमी आवाजें आ रही थीं।
“कहीं ये कोई ड्रग्स का अड्डा तो नहीं?” शर्मा फुसफुसाया।
राघवन ने उसे चुप कराते हुए दरवाज़े की झिरी से झांका।
अंदर एक आदमी बैठा था। उसकी जैकेट पर खून के धब्बे थे। उसके सामने फर्श पर एक लाश पड़ी थी।
राघवन ने दहाड़ते हुए कहा—“हाथ ऊपर करो!”
वो आदमी कांपते हुए बोला—“मैंने उसे मार डाला… वो मेरी बहन को ब्लैकमेल करता था…”
राघवन ने पिस्तौल ताने हुए धीरे से कमरे में प्रवेश किया। लाश पर चाकू के निशान ताजे थे।
राघवन ने आरोपी को हथकड़ी पहनाते हुए कहा—“अपराध का अंजाम भुगतना पड़ेगा।”
बाहर पुलिस सायरन की आवाज़ गूंज उठी। बाक़ी टीम भी वहाँ पहुँच गई। लेकिन राघवन के चेहरे पर एक अजीब सा सवाल था—
क्या ये कत्ल वाकई खुद के बचाव में हुआ था, या इसके पीछे कोई और कहानी छुपी थी?
2
पुलिस स्टेशन में आरोपी से पूछताछ शुरू हुई। उसका नाम था अजय वर्मा। उसने बताया कि मृतक—नाम था करण मल्होत्रा—उसे ब्लैकमेल कर रहा था।
“वो मुझसे पैसे मांग रहा था,” अजय ने कांपते हुए कहा।
“क्यों?” राघवन ने सख्त लहजे में पूछा।
“उसके पास मेरी बहन के कुछ निजी फोटो थे… वो उन्हें वायरल करने की धमकी दे रहा था,” अजय ने सिर झुकाते हुए कहा।
राघवन को शक था—मामला इतना सीधा नहीं था।
“तुम्हारे पास कोई सबूत है?”
“नहीं…” अजय का चेहरा पीला पड़ गया।
राघवन ने फाइल में करण मल्होत्रा का नाम खंगालना शुरू किया।
करण का आपराधिक रिकॉर्ड निकला—ठगी, ड्रग्स, और अवैध वसूली के कई केस। लेकिन हाल ही में वो शहर छोड़ने की तैयारी कर रहा था।
राघवन को एहसास हुआ—करण की मौत सिर्फ ब्लैकमेल का मामला नहीं हो सकता।
उसी रात पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आई। करण के शरीर पर सिर्फ चाकू के घाव ही नहीं, बल्कि नाखून के निशान भी थे—किसी और के साथ संघर्ष के।
“कहीं और कोई तो नहीं था वहाँ?” राघवन ने खुद से कहा।
3
अगली सुबह राघवन उस मकान पर दोबारा पहुँचा। इस बार वो मकान का कोना-कोना खंगालना चाहता था।
“सर, ये देखिए…” शर्मा ने एक छुपा हुआ दरवाजा दिखाया।
राघवन ने टॉर्च जलाकर दरवाजा खोला। एक संकरी सीढ़ी नीचे बेसमेंट की तरफ जा रही थी।
बेसमेंट में घुप्प अंधेरा था। दीवार पर ताजा खून के छींटे थे। और एक पुराना सीसीटीवी कैमरा, जो धूल में लथपथ था।
“ये कैमरा चालू था?” राघवन ने पूछा।
“सर, लगता है चालू था… कार्ड भी लगा है,” शर्मा ने जवाब दिया।
राघवन ने तुरंत टेक्निकल टीम को बुलाकर फुटेज निकलवाया। उसमें जो दिखा, उससे सबके रोंगटे खड़े हो गए।
वो फुटेज दिखा रहा था कि करण के कमरे में अजय के अलावा एक और आदमी था—चेहरे पर मास्क और हाथ में पिस्तौल।
“ये कोई तीसरा आदमी भी है… जिसका इस कत्ल से कुछ लेना-देना है,” राघवन ने खुद से कहा।
4
राघवन ने फुटेज को ध्यान से देखा। नकाबपोश आदमी ने करण को धमकाया और फिर कमरे से निकल गया। तभी अजय अंदर आया और चाकू से हमला कर दिया।
“मतलब अजय ने कत्ल किया, लेकिन असली खेल नकाबपोश के इशारे पर खेला गया,” राघवन ने कहा।
“पर नकाबपोश कौन है?” शर्मा ने पूछा।
राघवन ने उस फुटेज को फ्रेम दर फ्रेम स्कैन किया। एक सेकंड के लिए नकाब के नीचे से एक टैटू झलक गया—एक सांप का टैटू।
“ये तो विजय ठाकुर का गैंग है,” शर्मा चौंक पड़ा।
विजय ठाकुर शहर का कुख्यात गैंगस्टर था, जो ड्रग्स और मर्डर केस में वांछित था।
“तो क्या करण विजय ठाकुर के लिए काम करता था? और अजय फंस गया?”
राघवन को यकीन हो गया—ये मामला सिर्फ ब्लैकमेल का नहीं, बल्कि एक बड़े गैंगवार का हिस्सा था।
अध्याय 5: अंतिम मुठभेड़
राघवन ने विजय ठाकुर के ठिकानों पर छापा मारा। तीन जगह तो खाली थे, लेकिन चौथे गोदाम में हलचल थी।
राघवन ने टीम को अलर्ट किया।
“गोदाम के चारों ओर घेरा डालो!”
भीतर से गोलियों की आवाज़ आई। ठाकुर का गैंग बुरी तरह फंस गया था।
“राघवन, मैं खुद को कानून से ऊपर मानता हूं!” विजय ठाकुर चिल्लाया।
“कानून से ऊपर कोई नहीं होता,” राघवन गरजा।
दोनों ओर से फायरिंग शुरू हो गई। १५ मिनट की भारी मुठभेड़ के बाद पुलिस ने विजय ठाकुर और उसके दो आदमियों को ढेर कर दिया।
अजय की बेगुनाही साबित हो गई, लेकिन उसकी गलती थी कि उसने खुद इंसाफ करने की कोशिश की।
राघवन ने केस की फाइल बंद करते हुए कहा—
“अपराध चाहे जो भी हो, इंसाफ का रास्ता सिर्फ कानून के जरिए ही सही होता है।”
समाप्ति




