प्रेम कहानियाँ
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सिगरेट के धुएं में एक अधूरी कविता
अन्वी शुक्ला बंद कमरा और अधूरी कविता इलाहाबाद विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग, समय की परतों से ढका हुआ, उन इमारतों में से एक था जहाँ दीवारें भी शेर सुनाती थीं। पुराने बरामदे, लोहे के गेट, और बरगद के नीचे लगे बेंच — सबमें कोई ना कोई दास्तान अटकी हुई थी। प्रोफेसर यतीन भटनागर, जिन्हें सब…
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चाय की टपरी वाला प्यार
राजीव कुमार शर्मा १ पुणे की सर्द सुबहें किसी पुराने गीत की तरह होती हैं—धीमी, धुंधभरी और मन को छू जाने वाली। नवंबर का महीना था, और हवा में एक अलग ही तरह की ठंडक थी जो कॉफी के मग या मोटी जैकेट से नहीं, किसी सच्चे अपने के पास बैठने से ही दूर हो…
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चाय और वो पुराना स्टेशन
नीलेश राघव स्टेशन वही था—प्लेटफॉर्म नंबर तीन, पुरानी लकड़ी की बेंच, जंग खाया पीला बोर्ड, और सामने वही चायवाला, जो कभी मेरी कॉलेज की सुबहों की शुरुआत करता था। अब भी वो पुराने केतली में चाय उबाल रहा था, जैसे वक्त ने उसे छुआ तक नहीं। मैंने पास जाकर कहा, “तू अभी भी यहाँ चाय…
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धड़कनों की दरमियाँ
नीरज सहाय भाग 1 सुबह की ठंडी हवा में हल्की-हल्की धुंध तैर रही थी। दिल्ली के पुरानी रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर तीन अपनी चिर-परिचित हलचल में डूबा था। चायवालों की आवाज़, कुलियों की पुकार, और यात्रियों की चहल-पहल के बीच एक कोना ऐसा था जहाँ समय जैसे कुछ देर के लिए ठहर जाता था…
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रंग तेरे मेरे बीच
चयनिका श्रीवास्तव जयपुर की पुरानी गलियों में बसे एक शांत मोहल्ले में, हल्के नीले रंग का एक छोटा-सा स्टूडियो था जहाँ से हर शाम एक अनकही ख़ामोशी और रंगों की सोंधी महक बाहर आती थी। वहाँ बैठती थी इशिता वर्मा—नेत्रहीन, मगर भावनाओं से भरी एक चित्रकार, जो रंगों को अपनी उंगलियों की नमी और हवा…
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छत की रेलिंग पर वो लड़की
नील मेहता मुंबई की उस सुबह में कुछ अलग था — जैसे भीड़ में भी एक ठहराव था, शोर में भी एक खामोशी छिपी हुई थी। राहुल ने खिड़की की परतों से आती धूप को चेहरे पर महसूस करते हुए अपनी आंखें खोलीं। नया अपार्टमेंट, नया बिस्तर, और एक अजनबी सी खामोशी। शहर तो वही…
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पहला पहला प्यार
सुरभि जब भी बारिश होती है, मेरी यादों की खिड़की अपने आप खुल जाती है। स्कूल की वो पुरानी इमारत, गीली ज़मीन से उठती मिट्टी की खुशबू, और एक लड़की—सादगी में लिपटी कोई कविता सी। उसका नाम था नेहा। और मेरा—अंशुमान। हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे—राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, जयपुर। क्लास १०-बी।…
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वो बारिश की आखिरी बूँद
अन्वी शर्मा मसूरी की वादियाँ उस दिन कुछ ज़्यादा ही ख़ामोश थीं। हल्की बारिश की बूँदें पेड़ों की पत्तियों से फिसलती हुई ज़मीन को चूम रही थीं, और दूर-दूर तक एक धुंधली सी चादर फैल चुकी थी। लाइब्रेरी की पुरानी लकड़ी की खिड़की से टिककर बैठी आव्या वही किताब फिर से पढ़ रही थी—‘निराला की…
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खामोशियों में तुम्हारा नाम
आर्या वर्मा स्टेशन की उस सुबह सर्दी की हल्की चादर ओढ़े दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन पर सुबह-सुबह हलचल कुछ ज़्यादा थी। ट्रेन के हॉर्न, कुलियों की आवाज़, चायवाले की पुकार—सब कुछ रोज़ जैसा ही था। लेकिन उस दिन कुछ अलग भी था, कुछ ऐसा जो आरव की दुनिया बदलने वाला था। आरव, एक चुपचाप…
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तेरे नाम सा कुछ…
शर्मिष्ठा दीक्षित दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस में नए सत्र की चहल-पहल थी। अगस्त की उमस भरी सुबह, बादलों की ओट से झांकती धूप, और कॉलेज की पुरानी बिल्डिंग के गलियारे, सब कुछ जैसे किसी नई कहानी के लिए तैयार खड़ा था। पहला साल, नया कॉलेज, नई किताबें, और अनगिनत अनजाने चेहरे। इन्हीं चेहरों में…
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बरसात की वो शाम
स्वप्निल वर्मा दिल्ली की वो शाम बेहद भीगी हुई थी। जून का आख़िरी हफ्ता था और मौसम विभाग ने जिस बारिश की चेतावनी दी थी, वो अब हक़ीक़त बनकर शहर की सड़कों को बहा ले जा रही थी। बिजली चमक रही थी, ठंडी हवाएं चल रही थीं और हर गली-मोहल्ला जैसे पानी के नीचे डूबा…












