Hindi
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कोठी का आईना
अविनाश त्रिपाठी १ गांव के बीचोंबीच, ऊँचे-ऊँचे बरगद और पीपल के पेड़ों की छाया में, एक पुरानी हवेली खड़ी थी। चारों ओर जंगली घास ने ज़मीन को ढक लिया था और हवेली की दीवारें जगह-जगह से उखड़ चुकी थीं। बरसों की बरसात और धूप ने ईंटों पर काई जमा दी थी, मानो किसी ने उसे…
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खून से लिखी वसीयत
१ ठाकुर अजय प्रताप सिंह अपने इलाके के सबसे चर्चित और सम्मानित जमींदार थे। जीवन की ढलती उम्र में भी उनकी आवाज़ और व्यक्तित्व में वही रौब था जो युवावस्था में दिखता था। विशाल हवेली, लंबा-चौड़ा बगीचा, दर्जनों नौकर और जमीन-जायदाद के अनगिनत कागजात—सब कुछ मानो उनकी शख्सियत का विस्तार थे। लेकिन उस रात हवेली…
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छोटी गली के बड़े किस्से
अभिषेक त्रिवेदी एपिसोड 1 : गली का नक्शा और पहला झगड़ा कहानी शुरू होती है एक ऐसे मोहल्ले से, जो शहर के नक्शे में देखने पर बिल्कुल भी दिखाई नहीं देता। नगर निगम का नक्शा बनाने वाला जब इस हिस्से तक पहुँचा तो उसकी पेंसिल की नोक टूट गई, और उसने वही अधूरा छोड़ दिया।…
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तारों भरी रात
अदिती वर्मा १ पहाड़ों की ओर रवाना होने से पहले कॉलेज के कैंपिंग ट्रिप का माहौल अपने आप में उत्साह और ऊर्जा से भरा हुआ था। आरव और नंदिनी अपने दोस्तों के साथ सुबह के समय कॉलेज परिसर में इकट्ठे हुए, जहाँ हर कोई अपने बैग में जरूरी सामान भर रहा था—तंबू, स्लीपिंग बैग, कैंपिंग…
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सन्नाटे की दीवारें
कुणाल राठौर एपिसोड 1 : तहखाने की खिड़की रात ढाई बजे दिल्ली की हवा भारी थी। डिफेंस कॉलोनी की पुरानी कोठी—डी-17—के बाहर पुलिस की पीली पट्टी लगी थी। भीतर कदम रखते ही रिपोर्टर नैना त्रिपाठी को महसूस हुआ मानो दीवारें खुद साँस ले रही हों। बरामदे में एक परिचित चेहरा दिखा—राघव मेहरा, क्राइम ब्रांच के…
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“सपनों की खिड़की”
अदिति राठी भाग 1 – मुलाक़ात दिल्ली की सर्दियों में धूप किसी पुराने कंबल की तरह होती है—पतली, मगर भरोसेमंद। अनाया ने खिड़की पर टंगी धुले हुए कपड़ों की कतार के बीच से झांककर आकाश को देखा और घड़ी पर नज़र डाली। सुबह के आठ बजकर पैंतालीस। नौ बजे की ब्लू लाइन पकड़नी है। उसके…
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मुंबई की गणेश चतुर्थी
कुणाल कुलकर्णी १ मुंबई की धरती पर पहला कदम रखते ही कुणाल के मन में अजीब सी हलचल उठी। जैसे ही ट्रेन धीरे-धीरे छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) स्टेशन पर रुकी, खिड़की से झाँकते ही उसे हज़ारों चेहरों की चहल-पहल, पटरियों पर भागते कुलियों की आवाज़ें और लाउडस्पीकर पर गूंजती घोषणाओं का मिश्रण सुनाई दिया।…
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लखनऊ की कहकशां
समीरा आबरू पुराना लखनऊ उस शाम कुछ और ही रौनक में डूबा हुआ था। चौक की हवेली, जिसकी मेहराबों में अब भी पुराने ज़माने की नवाबी झलकती थी, आज रोशनियों से नहा रही थी। झूमरों की सुनहरी चमक, दीवारों पर लटकते रंग-बिरंगे पर्दे और आँगन में बिछे मोटे क़ालीन, सब मिलकर माहौल को एक अदबी…
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काला लैम्पपोस्ट
ऋषभ शर्मा १ दिल्ली के उत्तरी हिस्से में एक ऐसा इलाका है जिसे लोग अब बस “पुराना औद्योगिक क्षेत्र” कहकर पुकारते हैं। कभी यहाँ कारख़ानों की कतारें थीं, मशीनों की आवाज़ और मजदूरों की भीड़ से गली-गली गूंजती रहती थी, लेकिन अब सब कुछ खंडहर में बदल चुका है। टूटे हुए शटर, जंग लगे बोर्ड,…
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आख़िरी ट्रेन टू बनारस
सौरभ पांडेय भाग 1 – बनारस की रात बनारस स्टेशन की पुरानी घड़ी रात के ग्यारह बजकर पैंतीस मिनट दिखा रही थी और प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ियों की आवाजाही थम-सी गई थी, आख़िरी ट्रेन के इंतज़ार में कुछ बचे-खुचे यात्री धीरे-धीरे अपनी चादरें समेट रहे थे, कोई थैले से समोसा निकालकर खा रहा था, तो कोई…
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अंधेरी गली का सच
अनुराग मिश्रा हवेली की घंटी पुराना दिल्ली दरवाज़ा रात के बादलों में घुलकर एक फीकी आकृति बन गया था, और उसके पीछे से चलती संकरी गलियाँ अपने-अपने नाम भूलकर बस एक ही लय में सांस ले रही थीं—धीमी, टुकड़ों में टूटी, जैसे बहुत पुरानी घड़ी की टिक-टिक; उन्हीं गलियों में उस रात मुकुल चला आ…
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वाराणसी की गलियों में
सत्यजीत भारद्वाज १ वाराणसी की सुबह उस दिन हमेशा की तरह गंगा की धुंधली लहरों से जागी थी, लेकिन डेविड मिलर के लिए यह क्षण किसी सपने की तरह था। रातभर की रेलयात्रा और थकान के बावजूद जैसे ही उसने स्टेशन से बाहर कदम रखा, उसके चारों ओर की हलचल ने उसकी थकान को कहीं…












