प्रेतकथा
-
बेरोज़ा हवेली का अंतिम दीपक
मानव वर्धन १ मध्य प्रदेश के भीतरी हिस्सों में बसा था एक पुराना, लगभग भुला दिया गया गाँव — बेरोज़ा। इस गाँव का नाम तक मानचित्रों में साफ़ नहीं दिखता था, लेकिन उसकी कहानियाँ लोकगीतों और बुज़ुर्गों की फुसफुसाहटों में अब भी ज़िंदा थीं। किसी जमाने में यह इलाका राजा वीरप्रताप सिंह के अधीन था,…
-
कान्हा के काले धागे
प्रकाश पांडेय प्रवीर एक छोटे से गाँव गंगावटी में पहुंचा, जहाँ वह अपने जीवन की तकलीफों से बचने के लिए एक नया आरंभ करना चाहता था। अपनी मां की आकस्मिक मृत्यु के बाद, वह मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था। शहर के शोर-शराबे और हलचल से दूर इस शांत गांव में आने का…
-
नरसंहार की रात
विराज नागपाल १ रघुवीर राणा की जीप जैसे ही कच्ची सड़क पर धूल उड़ाती हुई आगे बढ़ी, सामने के दृश्य ने उसे सहसा खामोश कर दिया। सड़क के दोनों ओर सरसों के खेत अभी हरे ही थे, लेकिन उन खेतों के बीचोंबीच खड़ी एक बूढ़ी हवेली अपने पुराने ज़ख्मों की तरह झुलसी हुई दिख रही…
-
अंतिम आरती
हिमाचल की घाटियों में दिसंबर की रातें कुछ अलग ही किस्म की सन्नाटे से भरी होती हैं। हवा में बर्फ़ की गंध, पेड़ों पर जमीं सफेद चादर, और दूर कहीं से आती घंटियों की हल्की गूंज जैसे समय को रोक देती है। उन्हीं घाटियों में, देवदार के पेड़ों से घिरे एक पहाड़ी ढलान पर खड़ा…
-
अंधे कुएं की पुकार
विराज कुलकर्णी १ उत्तर भारत के एक सुदूर गाँव में जब सरकारी जीप धूल उड़ाती हुई दाखिल हुई, तो सूरज अपनी नारंगी किरणें खेतों की मेड़ों पर बिखेर रहा था। गाँव का नाम ‘गहना’ था — और सच में, यह गाँव घने सन्नाटे से ढका हुआ था। डॉ. अदिति वर्मा खिड़की से बाहर झाँकती रही;…
-
भूतिया तिजोरी
शुभदीप मिश्र वाराणसी स्टेशन की गर्म हवा में अजीब-सी गंध थी—कुछ धूप की, कुछ पुराने लोहे की, और कुछ जैसे समय की। शौर्य व्यास ने अपने ट्रॉली बैग का हत्था कसकर पकड़ा और भीड़ को चीरते हुए बाहर निकला। सालों बाद भारत लौटना उसे उतना अजनबी नहीं लगा, जितना लगा व्यास निवास का नाम सुनते…
-
पंचम गली की आत्मा
नवनीत मिश्रा बनारस के घाटों से दूर, पुराने शहर के भीतर एक मुड़ी-तुड़ी सी गलियों की भूलभुलैया में बसी थी पंचम गली — एक ऐसी जगह जो शहर के नक्शे में शायद दर्ज भी न हो, पर लोगों की यादों में सदी भर की कहानियाँ समेटे जीवित थी। यहीं पोस्टिंग हुई थी सब-इंस्पेक्टर अर्पित चौधरी…
-
पूर्णिमा की रात
श्रुति चतुर्वेदी अध्याय १: चाँदनी और लोककथा कुमाऊँ की पहाड़ियों में बसा वह छोटा सा गाँव अपनी ठंडी हवाओं, चीड़ के ऊँचे-ऊँचे वृक्षों और सदियों पुरानी लोककथाओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। बरसों से बुजुर्गों की कहानियों में एक रहस्य जिंदा था—पूर्णिमा की रात एक सफेद साड़ी में लिपटी औरत की परछाईं तालाब की…
-
द्रूपदी की आवाज़
रागिनी जैन अध्याय १: शालिनी और विशाल, दिल्ली से एक नई शुरुआत करने के लिए सिक्किम के एक छोटे से गांव में आकर बस गए थे। यह फैसला उन्होंने बहुत सोच-समझ कर लिया था। दोनों का मानना था कि शहर की भीड़-भाड़ और व्यस्तता से दूर, पहाड़ों में एक शांत जीवन जीना उनके लिए सबसे…












