यात्रा-वृत्तांत

  • साँझ की रोशनी में गोवा

    साँझ की रोशनी में गोवा

    मायूरी शंकर माया ने मुंबई की व्यस्त और तनावपूर्ण जिंदगी से थक कर गोवा जाने का फैसला किया था। वह एक कॉर्पोरेट पेशेवर थी, जो अपने काम में हमेशा डूबी रहती थी। हर दिन की भागदौड़, मीटिंग्स और डेडलाइन्स ने उसे मानसिक और शारीरिक थकावट का शिकार बना दिया था। वह किसी तरह अपने कार्यों…

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  • लौट चलें हेमकुंड

    लौट चलें हेमकुंड

    निशा अरोरा एक दिल्ली के उस सुबह की धूप बेहद सामान्य थी—उजली, लेकिन भावना से शून्य। अद्वैता शर्मा की खिड़की से छनकर आती रोशनी जैसे उसका चेहरा नहीं, उसकी पुरानी आदतों पर गिर रही थी। साढ़े सात बजे का अलार्म बंद कर वह वैसा ही उठी जैसे हर दिन, मैकेनिक की तरह। कॉफी मशीन चालू,…

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  • धागों के उस पार – एक रामेश्वरम यात्रा

    धागों के उस पार – एक रामेश्वरम यात्रा

    नीलय मेहता अनिरुद्ध सेनगुप्ता ने स्टेशन पर रुकती उस ट्रेन को देखा तो कुछ देर तक बस खड़ा रहा, जैसे कोई अंतर्मन उसे रोक रहा हो या शायद वही धक्का दे रहा हो जिसकी उसे वर्षों से तलाश थी। चेन्नई एগ्मोर से रामेश्वरम जाने वाली वह रात की ट्रेन उसके लिए किसी साधारण सफ़र का…

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  • वापसी की राह

    वापसी की राह

    अनिकेत तिवारी सुबह की भीड़भाड़ भरी दिल्ली, उसकी चिल्ल-पों और भागती ज़िंदगी की आवाज़ें जब भी खिड़की से भीतर आतीं, आदित्य के मन में एक खालीपन भर देतीं। उसकी ग्यारहवीं मंज़िल की बालकनी से दिखाई देता था ट्रैफिक का रेंगता हुआ सर्प, जिसके बीच वो भी रोज़ अपनी कार में फँसा रहता—सोचता हुआ कि आखिर…

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  • लौटते कदम

    लौटते कदम

    प्रणव शुक्ला दिल्ली की वो सर्द रात थी, जब शहर की इमारतें किसी नीरव कैदखाने जैसी लगती थीं। सड़कें रोशनी से जगमगा रही थीं, लेकिन उस रोशनी में भी अजीब-सा अंधकार फैला था — ऐसा अंधकार, जो दिल को चीरता चला जाए। आर्यन अपने ऑफिस की 25वीं मंज़िल की खिड़की से उस शहर को निहार…

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  • कैलाश के द्वार तक

    कैलाश के द्वार तक

    अनिर्बान दास उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे के कोने पर खपड़ैल की छत वाला पुराना त्रिपाठी निवास खड़ा था। बाहर बरामदे में तुलसी चौरे पर दिया जल रहा था, जिसकी मद्धम लौ में रात की निस्तब्धता भी जैसे प्रार्थना कर रही थी। घर के भीतर दीवारों पर लगे पुराने चित्रों में गुज़रे समय…

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  • चाय, पहाड़ और हम चार

    चाय, पहाड़ और हम चार

    संध्या अग्रवाल फिर मिलेंगे ज़रूर “याद है, हम चारों ने कॉलेज के आखिरी दिन क्या कहा था?” मीना की आवाज़ वॉट्सएप कॉल पर गूंजती है। “हाँ, ये कि हम हर साल एक ट्रिप करेंगे, खुद के लिए। और फिर?” कविता हँसती है, “फिर बच्चों के स्कूल, टिफिन, पति की मीटिंग और सास-ससुर की दवा लिस्ट!”…

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  • लद्दाख की वो आखिरी चाय

    लद्दाख की वो आखिरी चाय

    विशाल सक्सेना एक दिल्ली की उस सुबह में कुछ अजीब सी खामोशी थी—न ज़्यादा कोहरा, न ही सूरज की चमक। एक मद्धम सी उदासी अर्जुन के कमरे की दीवारों पर रेंग रही थी जैसे पिछली रात की नींद में किसी ने कुछ अधूरा छोड़ दिया हो। दीवार पर लटकी कैलेंडर की तारीखें टेढ़ी हो चुकी…

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  • एक सफर… खुद से मिलने का

    एक सफर… खुद से मिलने का

    रीनी शर्मा दिल्ली का जनवरी महीने का मौसम था। हल्की ठंड, कोहरे की चादर और भीड़-भाड़ से भरी सड़कें। हर इंसान जैसे किसी अदृश्य घड़ी की सुई के पीछे दौड़ रहा था—बिना रुके, बिना पूछे कि ये दौड़ किसके लिए है? इन्हीं लाखों चेहरों में एक चेहरा था अर्जुन मेहरा का—32 वर्षीय, सॉफ्टवेयर कंपनी में…

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